Showing posts with label islam. Show all posts
Showing posts with label islam. Show all posts

Saturday, July 25, 2009

श्रद्धा और सबूरी - भाग दो



ॐ साईराम, आज हम बात करते हैं श्रद्धा के विषय में आखिर श्रद्धा है तो क्या है? श्रद्धा किस चीज़ से जुडी है? कभी सोचा है आपने की ऐसा क्यूँ होता है जब आपके ईष्ट, आपके भगवान्, आपके साईं, आपके सामने होते हैं तो आपका मन आपकी भावनाए आपके बाबा को उसी तरह देखेंगी. अगर आपको गर्मी लग रही है आपको पसीना आ रहा है तो आपको लगेगा आपके बाबा को पसीना आ रहा है, बाबा को भी गर्मी लग रही है. अगर आपको लगेगा की सर्दियों में ठण्ड हो रही है आपको ठण्ड लग रही है आपको कोई कम्बल कोई स्वेटर ले लेना चाहिए तो आपको लगेगा की आपको बाबा को भी कम्बल ओढ़ाना चाहिए, रजाई ओढा देनी चाहिए क्यूंकि बाबा को भी ठण्ड लग रही है. बाबा ने तो कभी आपसे आके नहीं कहा, बाबा तो फकीर थे बाबा को तो ठण्ड लगेगी तो भी वही भाव और गर्मी लगेगी तो भी वही भाव. तो फिर ऐसा क्या है जो बाबा को और आपको जोड़ रहा है? हम कहते हैं की वो श्रद्धा है, बाबा के लिए हमारी श्रद्धा है जो हमें बाबा को मानवीय रूप में देखने पर मजबूर कर देती है और हमें ये आश्वासन देती है की बाबा हमारे साथ सशरीर मोजूद हैं. मगर श्रद्धा बिना भावना के नहीं होती. श्रद्धा कोई मेकेनिकल चीज़ नहीं है, श्रद्धा कोई तंत्र नहीं है, श्रद्धा कोई मन्त्र भी नहीं है. वास्तव में श्रद्धा भावना है. हमारे मन में, हमारे अंतःकरण में एक भावना छिपी है, हमारे बाबा के लिए. एक प्रेम है, एक अनुभूति है, आप उसे बयान नहीं कर सकते. कोई भी बयान नहीं कर सकता. प्रेम की परिभाषाए कई दी जा सकती हैं मगर प्रेम को बयान नहीं किया जा सकता. आप ये नहीं कह सकते की मेरा प्रेम अधिक है और दूसरे का प्रेम कम है, तो आप श्रद्धा को कैसे आंकेंगे? हम कहते हैं पैसेवाले हैं बहुत पैसा खर्च करते हैं तो इनमे कुछ अधिक श्रद्धा है या कुछ कहते हैं इनमे श्रद्धा नहीं है ये दिखावा है, पर ऐसा नहीं है. जो पैसा खर्च कर रहा है उसमे भी श्रद्धा है, जो पैसा नहीं खर्च कर रहा है केवल भावना से प्रणाम कर रहा है बाबा को उसमे भी श्रद्धा है. अंतर क्या है? अंतर ये है की जिस पर पैसा है वो उस श्रद्धा को प्रकट करने के लिए उस धन का प्रयोग कर रहा है. जिसमे भावनाय अधिक हैं वो भावनाओं का प्रयोग कर रहा है एक गरीब आदमी पांच हज़ार रूपए कमाता है और उसका दस प्रतिशत पांच सौ रूपए वो बाबा को दे देता है, एक अमीर जो पचास लाख रूपए कमाता है अगर पांच हज़ार, पचास हज़ार दे भी दे तो उसके खजाने में फर्क नहीं पड़ेगा. श्रद्धा, भावनाय ये धन की भूखी नहीं हैं.
तो मित्रो, श्रद्धा क्या है? श्रद्धा भावना है, और सबूरी उसका संबल है उसको रोकने के लिए. क्यूँ की भावनाय तो विचलित होती हैं और मानव की भावनाय सबसे ज्यादा विचलित होती हैं. मानव की भावनाय उसके आस-पास के क्षेत्र, उसकी आवश्यकता और ज़रुरत के हिसाब से बदलती रहती हैं. जब आपको लगेगा की कोई बहुत अच्छा आपके लिए कर रहा है, कोई भगवान् आपके लिए बहुत अच्छा कर रहा है तो आपको भावना उसके प्रति अलग होगी लेकिन जब आपको लगेगा की कुछ नहीं हो रहा है तो आपकी भावना अलग होगी. तो भावनाय विचलित होती रहती हैं. इसीलिए उनपर अंकुश लगाने की ज़रुरत है और बाबा ने वही अंकुश दिया सबूरी. बाबा ने सबूरी का अंकुश जो दिया वो इसलिए दिया की बाबा जानते थे की भावनाओं से श्रद्धा जुडी है और श्रद्धा विचलित हो जायेगी इसीलिए बाबा ने सबूरी का विषय दिया. तो श्रद्धा और सबूरी वास्तव में भावनाय हैं और भावनाओं के अतिरिक्त कुछ नहीं. ॐ साईराम.

Sunday, May 31, 2009

साईं भक्ति में अमीर खुसरो


जय साईराम, आप भी ये सोचकर हैरान हो रहे होंगे की आखिर अमीर खुसरू का साईं भक्ति या साईबाबा से क्या वास्ता है? वैसे तो श्रीसाईं सत्चरित्र में ये बात दावे से कही गयी है की सभी संत, पीर-फकीर, औलिया एक ही नूर और एक ही मालिक के मुरीद होते हैं और इन सबका एक आध्यात्मिक रिश्ता होता है. 1886 में जब बाबा ने बहत्तर घंटे की समाधी ली थी तब बंगाल में स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी ने देहत्याग किया था और बाबा उन्ही से मिलने गए थे ऐसा माना जाता है. जिस तरह बाबा का सम्बन्ध एक बंगाली गुरु स्वामी रामकृष्णा परमहंस से था या बाबा का सम्बन्ध एक पीर हजरत मानिक प्रभु से था या बाबा का रिश्ता अक्कलकोट के स्वामी समर्थ से था उसी कड़ी में हम ये कह सकते हैं की बाबा का सम्बन्ध हजरत निजामुद्दीन औलिया से भी था. ये सही है की हजरत निजामुद्दीन औलिया का शारीरिक जीवनकाल 1238 - 1325 ईसवी का था मगर साईंबाबा तो चिरंतन और अयोनिज हैं. अयोनिज वो होता है जिसका जन्म माता के शरीर से नहीं होता. इसी प्रकार संत कबीर को भी अयोनिज माना जाता है. कबीर भी एक जुलाहे को जंगल में मिले थे और बाबा को भी शिर्डी के लोगो ने 1854 में एक नीम के पेड़ के नीचे बैठे पाया था. आइये अब चर्चा करें की साईं भक्ति में अमीर खुसरू क्या हैं?

अमीर खुसरू (1253-1325 ईसवी) का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जो चगेज़ खान के समय में पटियाला, हिंदुस्तान में आकर बसे थे. सिर्फ आठ साल की उम्र में अमीर खुसरू के पिता उन्हें हजरत निजामुद्दीन औलिया महबूब-ए-इलाही से मिलवाने ले गए. वहां पहुँच कर अमीर खुसरू के पिता तो अन्दर चले गए मगर खुसरू बहार ही रुक गए. खुसरू ने सोचा की मैं कुछ शेर लिखकर अन्दर भेजता हूँ, अगर हजरत निजाम ने मुझे उनका जवाब दे दिया और अन्दर बुला लिया हो ही मैं अन्दर जाऊँगा. अभी खुसरू ने दो शेर ही लिखे थे की अन्दर से एक खादिम आया और खुसरू के हाथ में एक कागज़ थमा दिया और बोला हजरत ने आपको अन्दर बुलाया है. अमीर खुसरू ने देखा की उस कागज़ में उनके लिखे दोनों शेरो का जवाब था. खुसरू ने उसी वक़्त अल्लाह का शुक्रिया अदा किया और हजरत निजामुद्दीन औलिया महबूब-ए-इलाही के जानशीन मुरीद हो गए. इसके बाद हजरत अमीर खुसरू के तमाम कलाम और शेर हजरत निजामुद्दीन औलिया के चरणों में समर्पित हो गए. इसके बाद उनका और हजरत का गुरु-शिष्य का वो रिश्ता बना की हजरत निजामुद्दीन औलिया ने यहाँ तक कहा की अगर अमीर खुसरू उनके साथ अल्लाह के दरबार में नहीं जायेगे तो उनका कदम भी जन्नत में नहीं पड़ेगा. हजरत निजाम का ही कहना था की अगर इस्लाम में दो इंसानों को एक कब्र में दफन करने की इजाज़त होती तो वो ये वसीयत करके जाते की अमीर खुसरू को उनके साथ उनकी ही कब्र में दफन किया जाए. सबसे बड़ी बात तो ये है की हजरत निजामुद्दीन औलिया महबूब-ए-इलाही के इंतकाल फरमा जाने के कुछ ही दिन बाद खुद अमीर खुसरू भी ना रहे. आज दोनों गुरु-चेले की दरगाह एक साथ दिल्ली के निजामुद्दीन क्षेत्र में आस-पास बनी हैं.

अब हम बात करते हैं साईं भक्ति में अमीर खुसरू की. अमीर खुसरू का अपने गुरु, अपने मालिक, अपने दाता पर इतना अनुराग था की वो एक लम्हे के लिए भी अपने गुरु से दूर नहीं होना चाहते हैं. अमीर खुसरू भक्ति परंपरा के अग्रणी कवियों में शामिल हैं. भक्ति और समर्पण किसे कहते हैं ये अमीर खुसरू के जीवन की घटनाओ और उनके तमाम कलाम को पढ़ कर पता चलता है. "चाप-तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाये के" इस मशहूर कव्वाली को आप सभी ने सुना होगा इसी में एक शेर है "खुसरू निजाम के बली-बली जाए, मोहे सोहागन कीनी रे मोसे नैना मिले के". यहाँ सोहागन शब्द का प्रयोग है जिसे बहुत से लोग सुहागन पढ़ते हैं. सोहागन है वो शख्स जो खुद सोहागा हो गया है और किसी को भी सोना बनाने की ताक़त रखता है. वास्तव में गुरु भक्ति और समर्पण जो समझ गया वही सोना हो गया. हजरत अमीर खुसरू किसी कलाम में सचमच ये ताक़त है की वो किसी को भी 'भक्ति और समर्पण' की राह पर ला सकते हैं.

जिस दिन अमीर खुसरू जैसा प्यार, समर्पण, भक्ति, अनुराग, बेकरारी और मिलन की बेचैनी हम साईं भक्तो में हमारे श्रीसाईं किसी लिए पैदा हो जायेगी मेरा, एक साईं सेवक का, अपने गुरु, अपने मालिक की तरफ से आपसे वादा है की आप श्रीसाईं से एकाकार हो जायेगे. श्रीसाईं आपको वो देंगे जो आपने कभी सोचा भी ना होगा, माँगना तो बहुत दूर की बात है. इसलिए मेरा आपने निवेदन है की अपने मन में श्रीसाईं किसी लिए अमीर खुसरू जैसी भक्ति और समर्पण पैदा करें. -जय साईंराम