Thursday, April 9, 2009

गुस्सा भी आता था श्रीसाईं को

"सभी भक्त रामजन्मोत्सव मनाने की तैयारियाँ करने लगे। कीर्तन प्रारम्भ हो गया था। कीर्तन समाप्त हुआ, तब "श्री राजाराम' की उच्च स्वर से जयजयकार हुई। कीर्तन के स्थान पर गुलाल की वर्षा की गई। जब हर कोई प्रसन्नता से झूम रहा था, तब अचानक ही एक गर्जती हुई ध्वनि उनके कानों पर पड़ी। वस्तुत: जिस समय गुलाल की वर्षा हो रही थी तो उसमें के कुछ कण अनायास ही बाबा की आँख में चले गये। तब बाबा एकदम क्रुद्ध होकर उच्च स्वर में अपशब्द कहने व कोसने लगे। यह दृश्य देखकर सब लोग भयभीत होकर सिटपिटाने लगे।"

"एक बार शामा को विषधर सर्प ने उसके हाथ की उँगली में डस लिया। शामा मस्जिद की ओर ही दौड़ा-अपने विठोबा श्री साईबाबा के पास। जब बाबा ने उन्हें दूर से आते देखा तो वे झिड़कने और गाली देने लगे। वे क्रोधित होकर बोले-""अरे ओ नादान कृतघ्न बम्मन ! ऊपर मत चढ़। सावधान, यदि ऐसा किया तो ।'' और फिर गर्जना करते हुए बोले, "" हट, दूर हट, नीचे उतर।''

"एक अवसर पर मौसीबाई बाबा का पेट बलपूर्वक मसल रही थीं, जिसे देख कर दर्शकगण व्यग्र होकर मौसीबाई से कहने लगे कि ""माँ! कृपा कर धीरे-धीरे ही पेट दबाओ। इस प्रकार मसलने से तो बाबा की अंतड़ियाँ और नाड़ियाँ ही टूट जाएँगी।'' वे इतना कह भी न पाए थे कि बाबा अपने आसन से तुरन्त उठ बैठे और अंगारे के समान लाल आँखें कर क्रोधित हो गए। साहस किसे था, जो उन्हें रोके? उन्होंने दोनों हाथों से सटके का एक छोर पकड़ नाभि में लगाया और दूसरा छोर जमीन पर रख उसे पेट से धक्का देने लगे। सटका (सोटा) लगभग 2 या 3 फुट लम्बा था। लोग शोकित एवं भयभीत हो उठे कि अब पेट फटने ही वाला है। बाबा अपने स्थान पर दृढ़ हो, उसके अत्यन्त समीप होते जा रहे थे और प्रतिक्षण पेट फटने की आशंका हो रही थी।"

"विजया दशमी के दिन जब लोग सन्ध्या के समय " सीमोल्लंघन' से लौट रहे थे तो बाबा सहसा ही क्रोधित हो गए। सिर पर का कपड़ा, कफनी और लँगोटी निकालकर उन्होंने उसके टुकड़े-टुकड़े करके जलती हुई धूनी में फेंक दिए। वे पूर्ण दिगम्बर खड़े थे और उनकी आँखें अंगारे के समान चमक रही थीं । उन्होंने आवेश में आकर उच्च स्वर में कहा कि "लोगो! यहाँ आओ, मुझे देखकर पूर्ण नि‚चय कर लो कि मैं हिन्दू हूँया मुसलमान।'' सभी भय से काँप रहे थे।"

श्रीसाईं सत्चरित्र में वर्णित उपरोक्त घटनाओं से स्पष्ट है हमारे परमशांत आत्मस्थित श्रीसाईं को बहुत क्रोध आता था. कभी-कभी तो ये क्रोध और बाबा के अपशब्द इतना बढ़ जाते थे की भक्तो को बाबा से संत स्वरुप होने पर संदेह होने लगता था. बाबा क्रोध में अपशब्द कहते और कभी-कभी तो आस-पास रखी वस्तुए उठाकर फेकने लगते थे. मगर आपने देखा होगा की माँ भी कभी-कभी क्रोध में बच्चे को मारती है मगर ये स्वभावगत होता है की माँ की इस मार का बच्चे को हमेशा लाभ ही होता है. बाबा की इन कथाओं से स्पष्ट है की बाबा भी भक्तो के विकारों और दुर्गुणों को दूर करने के लिए उन्हें अपशब्द कहते या दुत्कारते थे.

रामनवमी के अवसर पर बाबा का क्रोध करना स्वाभाविक था क्यंकि इस दिन बाबा भक्तो को दिखाना चाहते थे की उनके अन्दर बसे रावण का संहार करने के लिए ही बाबा यहाँ भक्तो के बीच में आये हैं और रामनवमी का अर्थ भी श्रीसाईं की शिक्षाओं में यही है की रामनवमी के दिन हम अपने मन में, अपने चरित्र में श्रीराम को स्थापित करें और अपने अन्दर के रावण से मुक्ति पायें.

दूसरी घटना शामा के लिए नहीं बल्कि विषधर सर्प के लिए कही गयी थी. साँप का ज़हर धीरे-धीरे शामा के अन्दर चढ़ रहा था और बाबा ने उसे ही लक्ष्य करके उसे नीचे उतरने का आदेश दिया था.

तीसरी घटना स्पष्ट करती है की बाबा का अपने भक्तो से अनन्य प्रेम और अनुराग था. बाबा चाहते थे की भक्त उनकी पूजा अपने मन के अनुसार करें, क्यूंकि जब मन बाबा से जुड़ जायेगा तो मोक्ष प्राप्ति में कोई अवरोध नहीं होगा.

चौथी घटना विशेष रूप से भक्तो को दो बात स्पष्ट करने के लिए थी. पहली तो ये की बाबा को उनके धर्म विशेष से संबोधित करना मूर्खता है और बाबा को ये बिलकुल पसंद नहीं था और दूसरे इस घटना के ठीक एक वर्ष बाद बाबा ने अपनी पावन देह त्याग दी और सदा के लिए भक्तो के ह्रदय में बस गए.

हमारे लिए इन घटनाओं का विशेष महत्त्व ये है की यदि हम बाबा की शिक्षाओं के अनुकूल नहीं रहे तो बाबा एक बार फिर क्रोधित होकर हमे अपना रौद्र रूप दिखा सकते हैं. मेरी तो बाबा से प्रार्थना है की बाबा चाहे दंड देने में लिए ही सही कम से कम हमें एक बार दर्शन तो दो. जय साईं राम.

दियासलाईया इकट्ठी करने वाला संत साईबाबा

बाबा कहाँ हैं? अमीरों के महलो में भी हैं, गरीबो के झोपडो में भी। शिर्डी के विशाल समाधी मंदिर में भी और मुंबई की सड़क के किनारे एक छोटे से चबूतरे पर भी। जो सोचते हैं बाबा को स्वादिष्ट और बढ़िया भोजन पसंद है वो बाबा को पनीर या मखाने की सब्जी और मेवा मिला हलुआ खिलाते हैं तो जिनके खीसे में उनकी दाल रोटी भी मुश्किल से आती है वो बाबा को भाकरी और खिचडी का भोग लगाते हैं। कुछ बाबा को ज़री और सोने की तारो से जडा सिल्क का चोल पहनाते हैं तो कुछ बाबा को एक छोटे से कपडे के टुकड़े से ढकने की कोशिश करते हैं।

यहाँ सवाल ये है की क्या आप बता सकते हैं की आखिर इनमे से कौन बाबा को सच्चा प्यार करता है? दोनों ही तरफ के अपने तर्क हैं और अपनी भावनाए। वास्तव में बाबा दोनों ही के दिल में हैं. ना तो अमीर झूठा और ना ही गरीब फरेबी. कुछ साईं मंदिरों में बाबा का शयनकक्ष बनाया गया है जिसमे एअरकंडीशनर तक लगा है और कुछ आस्था के मंदिर ऐसे भी हैं जहाँ बाबा खुले आसमान के नीचे चौबीसों घंटे अपने प्यारे बच्चो के लिए विराजमान हैं. दुनिया में इतना विशाल और विलक्षण व्यक्तित्व श्रीसाईं के अलावा और शायद किसी का नहीं है. बाबा अपने सभी बच्चो को सामान नज़र से देखते हैं और उनका प्यार भी सभी के लिए एक जैसा है. बाबा को ना तो स्वर्ण आभूषनो से जड़े अलंकारों से प्रेम है और ना ही सूती कपडे पहनने में कोई घृणा. बाबा एक निर्विकार और निर्लिप्त पिता के सामान सभी को एक समझते हैं.

बाबा सिर्फ हमारी तरफ देखते हैं और हमारा उद्धार सिर्फ उस इक निगाह से हो जाता है। बाबा को देसी घी में बने हलुए और मिष्ठान भी उतनी ही तृप्ति देते हैं जितना सुख उन्हें खिचडी और भाकरी में मिलता है। अब आप ही बताओ बाबा को हम आखिर दें तो क्या दें? बाबा को सिर्फ हमारा प्यार और समर्पण चाहिए। बाबा को ऐसे भक्तो की भारी भीड़ चाहिए जो उनके दिखाए रास्ते पर चले और उनके दिव्य संदेशो को दुनिया के सभी दुखी और बेसहारा लोगो तक पहुंचाय। बाबा ने श्रीसाईं सत्चरित्र में अपना दिव्य रूप तो दिखाया ही है साथ ही बताया है की वो दियसलाइया इकट्ठी करने वाले एक दिव्य पुरुष हैं। मुझे तो बाबा ऐसे ही दिखाई देते हैं और मेरी बाबा से प्रार्थना है की हमेशा मेरे मन में वही दियासलाईया इकट्ठी करने वाले संत के रूप में विराजमान रहना जिससे मैं भी खुद को अंहकार से वशीभूत होता ना पाऊ। जय साईंराम।

Sunday, March 8, 2009

श्री मुकुल नाग से साईं चर्चा में अमित माथुर

साईं चर्चा करने में सभी को अत्यंत आनंद मिलता है। पिछले दिनों श्रीमुकुल नाग से बाबा के विषय में हुई चर्चा के कुछ अंश:
अमित: श्री साईं सत्चरित्र के अनुसार बाबा ने बहुत सी लीलाये की हैं। किसी सज्जन ने तो गड़ना की है श्रीसाईं सत्चरित्र में 64 चमत्कारों का उल्लेख है। आपको बाबा की कौन सी लीला सबसे मनोहर लगती है और क्यूँ?
मुकुलजी: बाबा ने 64 लीलाये नहीं 64 चमत्कार किये हैं ऐसा लिखा है। लीलाओ और चमत्कारों में कुछ भेद है, ऐसा मुझे लगता है।
अमित: कृपया स्पष्ट कीजिये...
मुकुलजी: वास्तव में चमत्कार तो वो हैं जो किसी न किसी प्रकार से विज्ञान के बनाए नीति-नियमो को गलत ठहराते हैं मगर लीलाये वो हैं जो भक्त के मन को पूरी तरह से आंदोलित करके भक्त के मन में परिवर्तन कर देती हैं और भक्त के मन में भगवान् और गुरु को स्थाई रूप से विराजमान कर देती हैं।
अमित: जी, मेरा प्रश्न स्वाभावतः चमत्कारों से है क्यूंकि बाबा की लीलाओ को अच्छा या कमतर आंकना बेवकूफी की बात है।
मुकुलजी (हंसते हुए): हाँ सच कहा बाबा के विषय में बोलते हुए अपने मन-मस्तिष्क को पूरी तरह बाबा के ध्यान में लगाना चाहिए। चलिए अब आपके प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करता हूँ। बाबा से प्रार्थना है की मेरे उत्तर को आपके पाठको के लिए लाभदायक बनाए. बाबा के बहुत से चमत्कारों में केवल बाबा की भक्त परायणता ही दिखाई देती है. बाबा ने कोई भी चमत्कार केवल इसलिए नहीं किया की लोग उस चमत्कार से प्रभावित होंगे, बल्कि ज्यादातर चमत्कार बाबा ने भक्तो को शिक्षा देने के उद्देश्य से किये थे. मुझे बाबा के वो चमत्कार पसंद हैं जहाँ वो शिर्डी से जाने वालो को अपनी मर्ज़ी से आज्ञा देते थे. बाबा की बात ना मानने वाले भक्तो को कष्ट ही उठाना पड़ता था. इसीलिए सच है की 'बाबा को मानो और बाबा की मानो'.
अमित: बाबा के भक्तो में सबसे प्रिये भक्त आपको कौन लगता है? बाबा को तो सभी भक्त प्रिये थे मगर आपको श्रीसाई लीलापुरुषोत्तम का कौन सा भक्त सबसे अच्छा लगता है?
मुकुलजी: वैसे तो सभी भक्त अपने-अपने स्थान पर बाबा के संदेशो और शिक्षाओं को सामने लाते हैं मगर मुझे श्यामा गुरूजी सबसे अधिक पसंद हैं। इसका सबसे बड़ा कारण तो ये है की सदगुरु के चरणों में ये गुरु सदा झुकते रहे और साथ ही साथ बाबा से सबसे अधिक तर्क-वितर्क भी श्यामा गुरूजी ही किया करते थे। मुझे याद आता है स्वामी रामकृष्णा परमहंस ने कहा था की शिष्यों का अधिकार है की वो अपने गुरु को अच्छी तरह से ठोक-बजा कर देख लें और जब सब कुछ सही लगे तब अपना सर्वस्व उस गुरु के चरणों में अर्पित कर दें. श्यामा गुरूजी भी इसी प्रकार बाबा के द्वारा होने वाली लीलाओ का कारण पूछकर प्यासे भक्तो को ज्ञान रुपी शिक्षाओं का पान करवाते थे. यही कारण है की मुझे श्यामा गुरूजी सबसे अधिक पसंद हैं.
अमित: बाबा ने अध्याय 49 में नानासाहेब चांदोरकर को मन पर लगाम रखने और इन्द्रियों को लम्पट होने से रोकने पर बल दिया है। आज के समय में क्या संभव है?
मुकुलजी: बिलकुल नहीं, मेरे विचार से बाबा की किसी भी शिक्षा में उसे अक्षरक्ष पालन करने को कहा हो ऐसा नहीं है। आज के समय में जब हमारे आस-पास का सारा संसार लम्पट हो रहा है तो हमारे लिए साधू बने रहना बिलकुल भी संभव नहीं है। मगर वहीँ आपने ध्यान दिया हो तो ऐसा कहा गया है की आप सुन्दरता को क्या सोचकर देखें. मन को लम्पट न होने देने का एक साधन तो यही है की आप किसी की सुन्दरता में वासना नहीं बल्कि परमपिता परमेश्वर की रचना का दर्शन करें. आप सुन्दर युवती या युवक को देखकर परमेश्वर को शुक्रिया करें की हे परमेश्वर तूने कितनी सुन्दर रचना की है. मन में वासनात्मक विचारों को ना आने दें. प्रत्येक स्थिति में सामान्य रहे.
अमित: मेरा अनुभव है की बाबा से जुड़ने और बाबा का अत्यधिक ध्यान करने पर हमारी मनःस्थिति बदल जाती है। हमारी सोच और ध्यान इस जग से हटने लगता है इसे रोकने का कोई तरीका आपके पास है?
मुकुलजी: पहले तो ये बताओ की बाबा के विचारो और शिक्षाओं की गंगा में बहने से खुद को रोकना ही क्यूँ है?
अमित: क्यूंकि बाबा के विचारो में रहने के कारण हमारा सामाजिक और पारिवारिक जीवन व्यवस्थित नहीं रहता...
मुकुलजी: हाँ, ये बात किसी हद तक सच है। जब आप बाबा के और उनकी लीलाओ के और उनके ध्यान में खोने लगते हैं तो पारिवारिक और सामाजिक जीवन जहाँ झूट बोलना, छल करना, गलत सोचना एक स्वाभाविक क्रिया है, प्रभावित होता है. मगर मेरे विचार से इस व्यवस्था का सञ्चालन करने का कार्य भी हमें बाबा को ही सौंप देना चाहिए. मैंने बहुत से साईं भक्तो को देखा है जो बाबा के ही ध्यान में डूबे रहते हैं मगर आप उन्हें कभी उनके कार्य स्थान पर देखिये, शायद आपको लगेगा की ये 'साईं भक्त' होने का ढोंग कर रहे हैं मगर वो बाबा के द्वारा संचालित क्रिया है जिससे वो यहाँ भी हैं और वहां भी.
अमित: मुकुल भैया, आपका बहुत बहुत धन्यवाद हमसे बातें करने के लिए। मैं बाबा से प्रार्थना करूँगा की आपकी इस चर्चा से साईं भक्तो को अध्यात्मिक लाभ प्राप्त हो। जय साईं राम.
मुकुलजी: जय साईं राम, मालिक आप सबका भला करे.

महामंदी से दुनिया परेशान है, साईं भक्तो के मुखड़े पर फिर भी मुस्कान है

त्यौहार फीके, रंग बेरंग, आम ज़िन्दगी का रूप बदरंग। दुनिया भर में छाई महामंदी से छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा सभी दुखी हैं. श्रीसाईं सत्चरित्र का विवरण लें तो बिलकुल वही दृश्य है जो शिर्डी के आसपास हैजा फैलने के समय था. जहाँ-तहां लोग मर रहे थे, परेशान थे, दुखी थे मगर श्रीसाईं के आशीर्वाद से शिर्डी की सीमओं के भीतर उस हैजे के प्रकोप ने अपने पैर तक नहीं धरे. हम श्रीसाईं के बच्चे हैं हमारा ये मानना है की हमारा मन श्रीसाई की शिर्डी है तो हमें ये भी समझना होगा की ये महामंदी उस हैजे के समान है. अगर उस हैजे का प्रकोप शिर्डी में क़दम नहीं धर सका था तो ये महामंदी हमारे मन को कैसे विचलित कर सकती है? जानता हूँ आप यही सोच रहे हैं की जिनको उस महामंदी ने निगला है उनमें से शायद मैं नहीं हूँ. बिलकुल सही है मगर पर-पीडा को ना समझ सकूं इतना कृपण भी मैं नहीं हूँ. मैं जानता हूँ की इस विकट परिस्थिति में जहाँ लोगो नें अपनी लगभग आधी सेलरी के बराबर किस्तें बना रखी हैं वो रखी सेलेरी आधी ही रह जायेगी तो कितनी मुसीबत में आ जायेंगे.

श्रीसाईं सत्चरित्र के अध्याय 18-19 में हेमाडपंत वर्णन करते हैं की सदगुरु अपनी संतानों का ध्यान वैसे ही रखते हैं जैसे एक कछुवी अपने बच्चो का ध्यान रखती है। कछुवी के बच्चे नदी के एक किनारे पर होते हैं और वो खुद दुसरे किनारे पर उसके बाद में कछुवी की प्रेम भरी दृष्टी ही उसके बच्चो का पालन-पोषण करती है. इसी प्रकार श्रीसाईं भी अपने बच्चो का पालन करते हैं. श्रीसाई की कृपा दृष्टी से उनके बच्चो के घर अन्न और वस्त्रो का कभी अभाव नहीं होता. बाबा ने इसी अध्याय में बताया है की उनके गुरु महाराज ने उनसे केवल दो पैसे मांगे थे 'श्रद्धा' और 'सबूरी' इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने शिष्यों को कोई गुरु मन्त्र नहीं दिया. बाबा ने भी सबसे यही दो वचन मांगे हैं.

आज इस महामंदी के विकराल दानव से श्रीसाईं के ये दो पैसे ही हमारी रक्षा करेंगे. आप अपने मन में 'श्रद्धा' रखें की श्रीसाईं हमारी कछुवी माँ है तो हमें केवल उस माँ के प्यार के सहारे ही इस दानव का सर्वनाश करने में सफलता मिलेगी बस इसके लिए हमें दुसरे पैसे 'सबूरी' की सहायता लेनी होगी. बहुत पहले एक साईंभक्त बहिन ने मुझे कहा था की 'बाबा को मत बताओ की तुम्हारी परेशानी कितनी बड़ी है, उस परेशानी को बताओ की तुम्हारा बाबा कितना बड़ा है'. बाबा ने खुद नाना साहेब चांदोरकर से कहा था "तुला कालजी कासले, माझा सारा कालजी आहे' यानि 'तुम्हे चिंता किस बात की है, तुम्हारी चिंता मुझे है'. तो अग़र वो बाबा हमारा करता धरता है तो हमें चिंता करने की कोई ज़रुरत ही नहीं है. आप साईं में यकीन रखें तो वो आपके यकीन में असर पैदा करेगा. बस यहीं हमेशा ध्यान रखें 'बाबा है ना'. दुनिया को दें की 'महामंदी से दुनिया परेशान है, साईं भक्तो के मुखड़े पर फिर भी मुस्कान है'.

Thursday, February 26, 2009

मैं साईबाबा नहीं हूँ

ॐ साईं राम, जब से मुझे साईबाबा सीरियल करने का सौभाग्य मिला है मेरी ज़िन्दगी में बाबा मेरे साथ-साथ चल रहे हैं ऐसा लगता है। मेरे हर फैसले में बाबा का आशीर्वाद शामिल है ऐसा मैं समझता हूँ। बाबा के भाव को अपने दामन में समेटना किसी के लिए भी आसान नहीं है। मैं तो प्रार्थना करता हूँ बाबा से और महाराष्ट्र के उन तमाम रंगमंचिये नाट्यकारो से, जो बाबा के शरीर छोड़ने के बाद से ही बाबा का अभिनय करते आ रहे हैं, की मुझे अपना आशीर्वाद और प्रेम दें जिससे मैं इस पावन और दुरूह कार्य को सहजता से कर सकूं। आज भी शूटिंग शुरू करते समय मन में सबसे पहले बाबा का नाम आता है की बाबा ये तुम हो जो दुनिया को टीवी पर दिखाई दे रहे हो। मुकुल नाग तो तुम्हारा चोला पहनने के बाद नेपथ्य में चला जाता है। ये बोलना, चलना, हाव-भाव, हँसना और सबका मालिक एक कहना सब तुम ही कर रहे हो और भक्तो को मुकुल नाग नहीं तुम यानि साईबाबा दिखाई दे रहे हो। बाबा ने इस प्रार्थना का उत्तर भी मुझे बहुत सुंदर तरीके से दिया। अपनी सभी लीलाओ की तरह जो वो पिछले लगभग 150 सालो से कभी शरीर रूप में और कभी समाधि के बाद दिखाते आ रहे हैं बाबा ने श्री जे पी शिशोदिया जी से मिलवाया और सन 2007 में मैंने शिर्डी साईं दरबार सपनावत में पहली बार बाबा के रूप में बाबा के उपस्थित भक्तो को बाबा की शिक्षाओ के बारे में बताया।

2007 की उस पवित्र शाम के बाद से बाबा ने मेरे चारो तरफ़ कसा अपना बाहों का शिकंजा और मज़बूत कर दिया। पहले तो शूटिंग के बाद कभी-कभी बाबा का विस्मरण को भी जाता था मगर अब तो जब शूटिंग नहीं होती तब कहीं न कहीं, कोई ना कोई मुझे मुझे बाबा के रूप में 'संदेश प्रचार' के लिए बुलावा दे ही देता है। कभी दिल्ली तो कभी लखनऊ, कभी इंदौर और कभी फगवाडा। बाबा को जहाँ भी अपनी उपस्थिति देनी होती है वो मेरे सर पर अपना हाथ रखते हैं और मुझे वहां जाने का सौभाग्य मिलता है। बाबा का रूप धारण करने के बाद मैं सिर्फ़ बाबा के ही बारे में सोचता हूँ। मेरी कोशिश होती है की बाबा के संदेशो को समय के साथ जोड़कर तमाम उपस्थित साईं भक्तो को कोई ऐसा संदेश दूँ की बाबा मुझसे खुश हों। मुझे परेशानी सिर्फ़ एक ही बात से होती है की बाबा का रूप धारण करने के बाद साईं के भक्त मेरे पैर छूते हैं और मुझे बाबा मानते हैं। मेरा मानना है की बाबा एक ही है। वो सबका मालिक भी है मित्र भी। बाबा ना तो कोई बन सका है और ना ही कोई बनेगा। वैसे अपनी जगह सभी संतो का एक विशेष स्थान है और मानव समाज को एक अच्छा समाज बनाने में सभी प्रयासरत हैं।

मैं तो सिर्फ़ यही निवेदन करना चाहूँगा की बाबा के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेना ही सबसे श्रेयस्कर है। मुकुल नाग तो आपको सिर्फ़ एक दोस्त और भाई की तरह दुआ दे सकता है मगर इस दुआ को ज़िन्दगी में बदलने की ताक़त सिर्फ़ और सिर्फ़ अनंतकोटी ब्रह्माण्डनायक राजाधिराज योगिराज परब्रह्म श्रीसच्चिदानंद समर्थ सतगुरु साईनाथ महाराज में ही है। आप सबको बाबा खुशी, सामर्थ्य और शान्ति दें यही बाबा से प्रार्थना है। -जय साईंराम

Tuesday, February 24, 2009

बाय बाय मनमाड

श्री साईं का आशीर्वाद जिसपर होता है वो कुछ ना होकर भी सबकुछ हो जाता है। श्री साईं की लीलास्थली शिर्डी गाव से सिर्फ़ सोलह किलोमीटर दूर होने के बावजूद कोपरगाव रेलवे स्टेशन की जगह श्री साईं तक पहुँचने के लिए साईंभक्तो ने 108 सालो तक शिर्डी से 65 किलोमीटर दूर स्थित मनमाड रेलवे स्टेशन का इस्तेमाल किया। मनमाड जिसे कोई जानता भी ना था और वहां कोई बहुत पुन्यवान संत भी नहीं गया। यहाँ तक की सर्वत्र में व्याप्त श्री साईनाथ स्वयं भी कभी मनमाड रेलवे स्टेशन गए हों ऐसा मैंने तो नहीं पढ़ा।
आप सोच रहे होंगे की आज अचानक मुझे मनमाड रेलवे स्टेशन क्यूँ याद आ रहा है। इसकी वजह यही है की मनमाड अब सिर्फ़ यादो में रह जाने वाला है। शिर्डी का अपना रेलवे स्टेशन अब बनकर तैयार है और इस महीने के आख़िर तक साईंनगर शिर्डी नाम के इस रेलवे स्टेशन का शुभारम्भ होने की उम्मीद है। सभी साईं भक्त अब सीधे शिर्डी रेलवे स्टेशन पर आने का सपना देख रहे हैं। अपनी शिर्डी यात्रा में मुझे सौभाग्य मिला की मैं श्री साईं के सबसे नज़दीक पहुँचने वाली ट्रेन के इस स्टेशन को देखू। सभी साईं भक्तो के लिए मैं इस रेलवे स्टेशन का विडियो अपने ब्लॉग पर दे रहा हूँ।




सभी साईं भक्तो की तमन्ना अब इस रेलवे स्टेशन के शुरू होने बाद पूरी हो जायेगी मगर एक दिन शायद मनमाड स्टेशन को सब भूल जायेंगे।


मनमाड स्टेशन ने 108 सालो तक साईं भक्तो की सेवा की है। मनमाड ने देखा है बाबा के बहुत से वचनों को सत्य होते हुए। इनमे से एक वचन था की 'एक दिन मेरे भक्त यहाँ चीटियों की भाँती आयंगे।' मनमाड ने देखा की जब भीड़ बहुत ज्यादा होती है तब कैसे साईं भक्त एक दूसरे का हाथ थाम कर पुल की सीढिया चढ़ते हैं। मनमाड ने देखा है की स्टेशन मास्टर के माथे पर कैसे पसीना आता है जब हजारो की भीड़ को प्लेटफार्म पर नियंत्रित करना होता है। मनमाड देखा है कैसे ऑटो और टैक्सी वाले यहाँ रुकने वाली हर एक ट्रेन को आशा की नज़र से देखते हैं और ग्राहक मिलने के बाद साईबाबा को धन्यवाद करते हैं। मनमाड ने देखा है कैसे लोग यहाँ गाड़ी का टाइम होने से दो-दो घंटे पहले आते हैं और स्टेशन के सामने वाले ढाबो में नाश्ता करते हैं। मनमाड ने देखा है की यहाँ से अपने शहर को जाने वाले कितनी मायूसी से इस स्टेशन को देखते हैं और साईं से प्रार्थना करते हैं की बाबा हमे फिर इस स्टेशन पर लाना क्यूंकि यही तो रास्ता है तुम्हारी शिर्डी तक पहुँचने का। मनमाड ने देखा है कैसे यहाँ से गुजरने वाली गाडियों से लोग उतरते हैं और स्टेशन के प्लेटफार्म को छूकर बाबा से आशीर्वाद मांगते हैं की अगली बार हमारी यात्रा बस यहीं तक हो। मनमाड स्टेशन, जो 108 साल बाद अब लगभग खाली रहा करेगा। जिस मनमाड स्टेशन पर उतर कर लोग शिर्डी की यात्रा शुरू करते थे अब उसी मनमाड पर गाड़ी रुकने को वक़्त की बर्बादी कहा करेंगे। मनमाड स्थान साईं लीला में सदा के लिए अमर हो जायेगा मगर शायद साईं भक्त इस स्टेशन को अब भूल जायेंगे।


प्यारे मनमाड, मैं तुम्हे हमेशा याद रखूँगा और दुआ करूँगा की मनमाड की जो गरिमा और आवश्यकता आज तक रही है वो सदा साईं भक्तो के मन में ताज़ा रहे। जिस तरह शिर्डी में खंडोबा मन्दिर, शनि-हनुमान-शिव मन्दिर, चावडी, द्वारकामाई, और लेंडी बाग़ बाबा की लीला में अमर हैं मनमाड रेलवे स्टेशन भी उसी तरह साईंलीला का एक अमर हिस्सा बन गया है। -जय साईं


समाचार : २८ फरवरी २००९ को श्री साईं भक्तो की सुविधा के लिए रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने 'साईंनगर शिर्डी' नाम के इस स्टेशन का शुभारम्भ किया और शिर्डी - मुंबई पहली रेल को झंडी दिखाकर रवाना किया। शिर्डी स्टेशन का उद्घाटन करने से पहले श्री यादव ने समाधि मन्दिर में बाबा के आगे पूजा की और आगामी चुनावों के लिए आशीर्वाद माँगा। सभी साईं प्रेमी भक्तो के लिए ये तस्वीर प्रस्तुत है।


Friday, February 13, 2009

हैप्पी वैलेंटाइनस डे

श्रीसाईं सच्चरित्र में बाबा ने कई स्थानों पर सत्यापित किया है की सभी संत आपस में भाई का रिश्ता रखते हैं। संत रामकृष्ण परमहंस के देहावसान के दिन तो बाबा ने बहत्तर घंटे के लिए अपने प्राण ब्रहम्मांड में चढ़ा लिए थे। आपको भी आश्चर्य हो रहा होगा की आख़िर आज मैं संतो के इस रिश्ते की बात कर क्यूँ रहा हूँ?


मित्रो जैसा की आपको मालूम है की कल 'वेलेंटाइनस डे' है। संत वैलेंटाइन का कोई भी अकाट्य प्रमाण न तो रोम के पास है, जहाँ के वो समझे जाते हैं और ना ही कहीं और इस बात का सबूत है की संत वैलेंटाइन नामक संत कभी हुआ है। मगर विश्व में ऐसे कई त्यौहार और पर्व हैं जिन्हें मानव की भलाई और विभिन्न समाजो में फैले झगडो को दूर करने वाले महान लोगो से जोड़ा गया है। संत वैलेंटाइन को भी नफरत और परस्पर वैमनस्य को दूर करके प्रेम का भाव पैदा करने वाले एक संत के रूप में जाना गया है।

'वैलेंटाइनस डे' जाना जाता है प्यार के लिए। जिस तरह 'होली' का त्यौहार प्रेम और एकता को बढ़ावा देने वाला पर्व है उसी प्रकार 'वैलेंटाइनस डे' भी प्यार और मुहब्बत को याद करने का पर्व है। 'वैलेंटाइनस डे' किसी भी तरह से 'वासना' से जुडा हुआ त्यौहार नहीं है. संत वैलेंटाइन ने कभी भी अपनी पत्नी या किसी महिला मित्र को लाल गुलाब का फूल देकर प्यार का इज़हार किया हो ऐसा कहीं नहीं आता. 'संत वैलेंटाइन' के जो भी किस्से और कहानिया प्रचलित हैं उसके अनुसार संत वैलेंटाइन ने समूची मानव जाती के लिए प्रेम का इज़हार किया था. आज भी जो लोग जानते हैं वो मानते हैं की 'वैलेंटाइनस डे' अपने सभी झगडे और नफरते भूल कर प्रेम और विश्वास बढ़ाने वाला त्यौहार है. मेरा विचार है की जब दो संस्कृतिया मिलती हैं तब एक संस्कृति समाप्त नहीं होती बल्कि उनके मेल से उन दोनों ही संस्कृतियों के संबंधो में प्रगाढ़ता आती है. वास्तव में मानव ने अपने जैसे लोगो को साथ जोड़कर एक संस्कृति का निर्माण किया ही इसलिए था की वो और ज़्यादा समृद्ध हो सकें.

मेरे विचार से 'वैलेंटाइनस डे' को भी आपसी प्रेम और विश्वास को बढ़ाने वाला पर्व मानते हुए, उन सभी लोगो को जो आपसे द्वेष और नफरत रखते हैं, गुलाब का फूल देकर 'हैप्पी वैलेंटाइनस डे' कहना चाहिए. वैसे भी आजकल हमारे पास इतना वक्त ही नहीं है की हम अपने मित्रो और साथियो से प्यार का इज़हार कर सकें इसलिए हमें भी 'वैलेंटाइनस डे' जैसे पर्व की नितांत आवश्यकता है. जहाँ तक श्रीसाईं का विचार करें तो बाबा ने भी हमें प्यार और आपसी भाईचारे का संदेश दिया है. बाबा का हमारे लिए प्यार भी संत वैलेंटाइन के जैसा ही है जो वक्त के साथ-साथ बढ़ता ही जा रहा है. बाबा को अपने मन में स्थान देते हुए वैलेंटाइनस डे के पर्व पर मैं श्रीसाईंनाथ महाराज को अपनी तरफ़ से 'हैप्पी वैलेंटाइनस डे' कहता हूँ आप अपनी तरफ़ से ख़ुद कहिये. -जे साईंराम