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Sunday, March 8, 2009

महामंदी से दुनिया परेशान है, साईं भक्तो के मुखड़े पर फिर भी मुस्कान है

त्यौहार फीके, रंग बेरंग, आम ज़िन्दगी का रूप बदरंग। दुनिया भर में छाई महामंदी से छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा सभी दुखी हैं. श्रीसाईं सत्चरित्र का विवरण लें तो बिलकुल वही दृश्य है जो शिर्डी के आसपास हैजा फैलने के समय था. जहाँ-तहां लोग मर रहे थे, परेशान थे, दुखी थे मगर श्रीसाईं के आशीर्वाद से शिर्डी की सीमओं के भीतर उस हैजे के प्रकोप ने अपने पैर तक नहीं धरे. हम श्रीसाईं के बच्चे हैं हमारा ये मानना है की हमारा मन श्रीसाई की शिर्डी है तो हमें ये भी समझना होगा की ये महामंदी उस हैजे के समान है. अगर उस हैजे का प्रकोप शिर्डी में क़दम नहीं धर सका था तो ये महामंदी हमारे मन को कैसे विचलित कर सकती है? जानता हूँ आप यही सोच रहे हैं की जिनको उस महामंदी ने निगला है उनमें से शायद मैं नहीं हूँ. बिलकुल सही है मगर पर-पीडा को ना समझ सकूं इतना कृपण भी मैं नहीं हूँ. मैं जानता हूँ की इस विकट परिस्थिति में जहाँ लोगो नें अपनी लगभग आधी सेलरी के बराबर किस्तें बना रखी हैं वो रखी सेलेरी आधी ही रह जायेगी तो कितनी मुसीबत में आ जायेंगे.

श्रीसाईं सत्चरित्र के अध्याय 18-19 में हेमाडपंत वर्णन करते हैं की सदगुरु अपनी संतानों का ध्यान वैसे ही रखते हैं जैसे एक कछुवी अपने बच्चो का ध्यान रखती है। कछुवी के बच्चे नदी के एक किनारे पर होते हैं और वो खुद दुसरे किनारे पर उसके बाद में कछुवी की प्रेम भरी दृष्टी ही उसके बच्चो का पालन-पोषण करती है. इसी प्रकार श्रीसाईं भी अपने बच्चो का पालन करते हैं. श्रीसाई की कृपा दृष्टी से उनके बच्चो के घर अन्न और वस्त्रो का कभी अभाव नहीं होता. बाबा ने इसी अध्याय में बताया है की उनके गुरु महाराज ने उनसे केवल दो पैसे मांगे थे 'श्रद्धा' और 'सबूरी' इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने शिष्यों को कोई गुरु मन्त्र नहीं दिया. बाबा ने भी सबसे यही दो वचन मांगे हैं.

आज इस महामंदी के विकराल दानव से श्रीसाईं के ये दो पैसे ही हमारी रक्षा करेंगे. आप अपने मन में 'श्रद्धा' रखें की श्रीसाईं हमारी कछुवी माँ है तो हमें केवल उस माँ के प्यार के सहारे ही इस दानव का सर्वनाश करने में सफलता मिलेगी बस इसके लिए हमें दुसरे पैसे 'सबूरी' की सहायता लेनी होगी. बहुत पहले एक साईंभक्त बहिन ने मुझे कहा था की 'बाबा को मत बताओ की तुम्हारी परेशानी कितनी बड़ी है, उस परेशानी को बताओ की तुम्हारा बाबा कितना बड़ा है'. बाबा ने खुद नाना साहेब चांदोरकर से कहा था "तुला कालजी कासले, माझा सारा कालजी आहे' यानि 'तुम्हे चिंता किस बात की है, तुम्हारी चिंता मुझे है'. तो अग़र वो बाबा हमारा करता धरता है तो हमें चिंता करने की कोई ज़रुरत ही नहीं है. आप साईं में यकीन रखें तो वो आपके यकीन में असर पैदा करेगा. बस यहीं हमेशा ध्यान रखें 'बाबा है ना'. दुनिया को दें की 'महामंदी से दुनिया परेशान है, साईं भक्तो के मुखड़े पर फिर भी मुस्कान है'.

Thursday, January 29, 2009

साईं शक्ति से साईं कार्य में

ॐ साईं राम, भारत सदा से ही विभिन्नाताओ में एकता का देश रहा है। दुनिया के किसी भी देश में इतने धर्म और सम्प्रदाय एक साथ खुशी-खुशी नहीं रहते। मेरे विचार में इसका सबसे बड़ा कारण यही है की समय-समय पर जब दिव्य संतो ने भारत की भूमि पर जन्म तब लोगो ने उन्हें दुत्कारा नहीं बल्कि सत्कारा है। भारत की सभ्यता और संस्कृति में संत पूजा और साधू सम्मान का स्थान गृहस्थो के लिए सबसे बड़ा धर्म है। दान और करुणा के बहुत से पाठ भारत के दिव्य संतो ने भारतवासियो को पढाये और भारत के रहने वालो ने उन संदेशो और विचारों को अपने जीवन में उतार लिया। श्रीसाईंबाबा से किसी भक्त ने पूछा "बाबा क्या आपके पास आने वाले सभी भक्तो का कल्याण हो जाता है?" तब बाबा ने बहुत शांत और समझाते हुए उत्तर दिया "अगर आम के पेड़ की सभी बौर आम बन जाएँ तो उन्हें गिनना और समेटना ही मुश्किल हो जायेगा। इसी प्रकार जिस भक्त का अन्तः मुझसे जुड़ गया हो और उसके ह्रदय में दया और करुणा का वास हो तो उस भक्त की सभी मनोकामनाये पूर्ण हो जाती हैं।"

जिस तरह बाबा के सभी भक्त एक जैसे नहीं हो सकते वैसे ही साईं समाज के सब सदस्य भी एक समान नहीं हो सकते। बाबा के इस समाज का सदस्य बनने के बाद जब कुछ साईं भक्तो को साईं संदेश के उलट काम करते हुए देखते हैं तो मन बहुत अशांत हो जाता है। साईं समाज में रहने और साईं भक्तो से जुड़ने में भी कष्ट का अनुभव होने लगता है। ऐसे बहुत से तथाकथित साईं भक्त मिलते हैं जो ख़ुद को बाबा का सबसे प्रिये मानते हैं और सिर्फ़ बाबा के नाम से जुड़ कर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं। ऐसे बहुत से भक्त मिलते हैं जो "बाबा का नेक काम है" कह कर अपनी अहंकारी और सांसारिक इच्छाओ को पूरा करना चाहते हैं।

श्रीनरसिंह स्वामी जी लिखते हैं की "जब मैंने बाबा के भक्तो का असली अनुभव एकत्र करना प्रारंभ किया तो मुझे ऐसे बहुत से लोग मिले जो अपने और बाबा के संबंधो का झूठा जाल बुने बैठे थे। मगर बाबा ने स्वयं ही मुझे विवेक दिया और मैं सही अनुभवों का संकलन करने में सफल हुआ" इसका अर्थ तो यही हुआ की साधारण समाज की तरह ही साईं समाज में भी अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के साईं भक्त मोजूद हैं। बाबा की अन्तः प्रेरणा और साईं स्मरण से ही इन साईं भक्तो से मुक्ति पाई जा सकती है।

सबसे पहले तो साईं के कार्यो का सारा श्रेय श्रीसाई को ही देना चाहिए। अगर किसी भी कार्य को करते हुए 'मैं' की भावना मन में आ गई तो समझिये दूध उबलने से पहले ही उसमे बिल्ली मुहं मार गई, अर्थात कार्य के आरम्भ होने से पहले ही उस कार्य का सत्यानाश हो गया। इस विशाल संसार में करने वाला भी साईं है और कराने वाला भी साईं ही है। हमे यही विचार करना चाहिए की हमारे सारे जीवन का एक मात्र ध्येय है 'साईं शक्ति से साईं कार्य में'।

Tuesday, January 27, 2009

सबका मालिक एक है

ॐ साईंराम, बाबा ने अपने जीवन के कुछ ही साल द्वारकामाई में बिताये मगर द्वारकामाई से जो संदेश उन्होंने सारी दुनिया के लोगो के लिए लिया वो सदा सर्वदा के लिए अमर हो गया. बाबा ने जिस समय शिर्डी में अवतार लिया था उस समय शिर्डी भारत के एक साधारण गाँव से अधिक नहीं था. समाज में बुराईया और कुरीतिया भरी पड़ी थी. बाबा ने हमेशा इन कुरीतियों और बुराइयों का विरोध किया और अपनी द्वारकामाई से बस एक ही संदेश दिया की सबका मालिक एक है. बाबा के कहने में कुछ जादू था. भक्तो ने सुना और बाबा की बताई राह चल पड़े. बाबा ने श्री साईं सत्चरित्र की कहानियो में बताया है की दुनिया की हर चीज़ में मालिक का अंश है. बाबा ने कहा की मुझे हर पशु-पक्षी, कीट-पतंग, सजीव-निर्जीव में समझो. बाबा वास्तव में केवल साढे तीन हाथ के प्राणी नहीं थे बाबा अपने आप में एक संस्कार, एक विद्यालय थे. बाबा के वचनों में हिन्दुओ की गीता, मुसलमानों की कुरान, सरदारों के गुरु ग्रन्थ साहिब और इसाइओ की बाइबल. बाबा कभी-कभी वो शिक्षा भी देते थे जो शायद किसी भी धर्मग्रन्थ में नहीं मिलेगी. बाबा के नाम का जो प्रभाव और स्पंदन उस समय भक्तो के मन में होता था वही आज भी हम अपने ह्रदय में महसूस कर सकते हैं. मुझे आपके संदेशो की प्रतीक्षा रहेगी।