
Wednesday, June 17, 2009
मानसिक चिकित्सा है श्रद्धा और सबूरी

Sunday, May 31, 2009
बाबा ने त्रिपुन्ड लगाने से भी मना किया था.

पिछले अंक में हमने देखा था कि बाबा ने द्वारकामाई मशीद के जीर्णोद्दार को रोकने का प्रयास किया था. इसके पीछे शायद बाबा का सन्देश था की मेरे लिए भव्य देवालयों के निर्माण कि कोई आवश्यकता नहीं है. मगर भक्तो के प्रेमवश करुणावतार श्रीसाईं ने द्वारकामाई के जीर्णोद्धार की आज्ञा दे दी. इसी प्रकार बाबा ने अपने मस्तक पर त्रिपुंड यानी महादेव के सामान तीन लकीरों वाले तिलक कि आज्ञा भी किसी को नहीं दी थी. श्रीसाईं सत्चरित्र में वर्णन है की कैसे और किस भक्त को सबसे पहले त्रिपुंड लगाने की आज्ञा मिली. लीजिये श्रीसाईं कथा का श्रवण कीजिये.
"एक बार श्री तात्या नूलकर के मित्र डॉक्टर पंडित बाबा के दर्शनार्थ शिरड़ी पधारे। बाबा को प्रणाम कर वे मस्जिद में कुछ देर तक बैठे। बाबा ने उन्हें श्री दादा भट केलकर के पास भेजा, जहाँ पर उनका अच्छा स्वागत हुआ। फिर दादा भट और डॉ. पंडित एक साथ पूजन के लिए मस्जिद पहुँचे। दादा भट ने बाबा का पूजन किया। बाबा का पूजन तो प्राय: सभी किया करते थे, परन्तु अभी तक उनके शुभ मस्तक पर चन्दन लगाने का किसी ने भी साहस नहीं किया था। केवल एक म्हालसापति ही उनके गले में चन्दन लगाया करते थे। डॉ. पंडित ने पूजन की थाली में से चन्दन लेकर बाबा के मस्तक पर त्रिपुण्डाकार लगाया। लोगों ने महान् आर्श्चय से देखा कि बाबा ने एक शब्द भी नहीं कहा। सन्ध्या समय दादा भट ने बाबा से पूछा, "क्या कारण है कि आप दूसरों को तो मस्तक पर चन्दन नहीं लगाने देते, परन्तु डॉ. पंडित को आपने कुछ भी नहीं कहा?'' बाबा कहने लगे," डॉ. पंडित ने मुझे अपने गुरु श्री रघुनाथ महाराज धोपेश्वरकर, जो कि काका पुराणिक के नाम से प्रसिद्ध हैं, के ही समान समझा और अपने गुरु को वे जिस प्रकार चन्दन लगाते थे, उसी भावना से उन्होंने मुझे चन्दन लगाया। तब मैं कैसे रोक सकता था?'' पूछने पर डाँ. पंडित ने दादा भट से कहा कि मैंने बाबा को अपने गुरु काका पुराणिक के समान ही जानकर उन्हें त्रिपुण्डाकार चन्दन लगाया है, जिस प्रकार मैं अपने गुरु को सदैव लगाया करता था।"
इसके पश्चात मेघा बाबा को महादेव का अवतार समझकर उनके पावन विशाल मस्तक पर त्रिपुंड लगाया करते थे. आज हम चर्चा करेंगे की बाबा ने त्रिपुंड लगाने की आज्ञा भक्तो को क्यूँ नहीं दी थी? यहाँ मैं स्पष्ट कर दू ये विचार मेरे खुद के मन में उठ रहे हैं और मैं किसी भी परंपरा या मज़हब के विरुद्ध नहीं हूँ.
बाबा हमेशा से इस बात का विरोध करते रहे की उनके धर्म और जन्म के विषय में कोई प्रश्न करे. वास्तव में संत और महात्मा किसी भी धर्म या जाति विशेष के नहीं होते. संत को काम होता है समाज को मोह से ऊपर उठाकर परमपिता की सेवा और राह में लगाना. जहाँ तक सनातन धर्म का सम्बन्ध है तो सनातन धर्म का तो लक्ष्य ही मोक्ष की प्राप्ति है. मोक्ष वो है जो धर्म से ऊपर है. मोक्ष वो है जिसके लिए समाज और मानव के बनाय कोई भी बंधन मान्य नहीं हैं. इसी प्रकार बाबा जो स्वयं मोक्षदाता हैं अपनी इस लीला के द्वारा भक्तो को सन्देश देते हैं की उन्हें किसी भी धर्म विशेष से ना जोड़ा जाए. मगर यहाँ भी बाबा भक्तो के प्रेम से वशीभूत होकर डॉक्टर पंडित को त्रिपुंड की आज्ञा दे देते हैं.
आज शिर्डी जाने वालो को महसूस होता है की शायद श्रीसाईं बाबा कोई हिन्दू संत थे. बाबा की चार आरतिया होती हैं, बाबा का मंगलस्नान होता है, बाबा को भोग लगता है, रामनवमी-गुरु पूर्णिमा-दशहरा माने जाते हैं मगर रामनवमी के साथ उर्स का जो आरम्भ हुआ था वो नादाराद है, चन्दन उत्सव की कोई चर्चा नहीं होती, यहाँ तक कि इसलाम या दुसरे धर्मो का आस-पास कहीं भी चिन्ह नहीं है. द्वारकामाई मशीद में आज भी एक 'आला' है जहाँ मुसलमान नमाज़ पढ़ते हैं, मगर अजान कि कोई आवाज़ नहीं होती. बाबा ने तो शिक्षा दी है है कि सब धर्मो का सम्मान करो मगर ईद और बड़ा दिन (क्रिसमस) जैसे मुख्य गैर-हिन्दू त्यौहार आज शिर्डी में नहीं माने जाते.
बाबा के समय में भी रामलाल पंजाबी के अतिरिक्त किसी सिख भक्त वर्णन श्रीसाईं सत्चरित्र में नहीं है और सिर्फ पंजाबी लिखा होने से ही वो सिख हैं ऐसा नहीं माना जा सकता. 1918 में बाबा का भौगोलिक क्षेत्र बहुत सीमित था. बाबा के स्वयं सशरीर विचरण का स्थान नीम गाँव और रहाता तक था मगर बाबा त्रिकालज्ञ थे उन्हें दुनिया में हो रही सब घटनाओं का पूर्ण ज्ञान था. मेरे विचार से हमे श्रीसाईं बाबा और उनकी लीलाओं को और प्रेमपूर्वक समझने की आवश्यकता है. हमें बाबा से प्रार्थना करनी चाहिए की 'हे! प्रेम, दया, करुणा, और कृपा की साक्षात् मूर्ती, हमें शक्ति और विवेक दो की हम आपकी लीलाओ में छिपे आपके सन्देश को समझ सकें.' जय साईंराम
साईं भक्ति में अमीर खुसरो

Tuesday, May 12, 2009
बाबा ने खुद डाला मस्जिद के जीर्णोद्दार में विघ्न
Thursday, April 9, 2009
गुस्सा भी आता था श्रीसाईं को
"सभी भक्त रामजन्मोत्सव मनाने की तैयारियाँ करने लगे। कीर्तन प्रारम्भ हो गया था। कीर्तन समाप्त हुआ, तब "श्री राजाराम' की उच्च स्वर से जयजयकार हुई। कीर्तन के स्थान पर गुलाल की वर्षा की गई। जब हर कोई प्रसन्नता से झूम रहा था, तब अचानक ही एक गर्जती हुई ध्वनि उनके कानों पर पड़ी। वस्तुत: जिस समय गुलाल की वर्षा हो रही थी तो उसमें के कुछ कण अनायास ही बाबा की आँख में चले गये। तब बाबा एकदम क्रुद्ध होकर उच्च स्वर में अपशब्द कहने व कोसने लगे। यह दृश्य देखकर सब लोग भयभीत होकर सिटपिटाने लगे।"
"एक बार शामा को विषधर सर्प ने उसके हाथ की उँगली में डस लिया। शामा मस्जिद की ओर ही दौड़ा-अपने विठोबा श्री साईबाबा के पास। जब बाबा ने उन्हें दूर से आते देखा तो वे झिड़कने और गाली देने लगे। वे क्रोधित होकर बोले-""अरे ओ नादान कृतघ्न बम्मन ! ऊपर मत चढ़। सावधान, यदि ऐसा किया तो ।'' और फिर गर्जना करते हुए बोले, "" हट, दूर हट, नीचे उतर।''
"एक अवसर पर मौसीबाई बाबा का पेट बलपूर्वक मसल रही थीं, जिसे देख कर दर्शकगण व्यग्र होकर मौसीबाई से कहने लगे कि ""माँ! कृपा कर धीरे-धीरे ही पेट दबाओ। इस प्रकार मसलने से तो बाबा की अंतड़ियाँ और नाड़ियाँ ही टूट जाएँगी।'' वे इतना कह भी न पाए थे कि बाबा अपने आसन से तुरन्त उठ बैठे और अंगारे के समान लाल आँखें कर क्रोधित हो गए। साहस किसे था, जो उन्हें रोके? उन्होंने दोनों हाथों से सटके का एक छोर पकड़ नाभि में लगाया और दूसरा छोर जमीन पर रख उसे पेट से धक्का देने लगे। सटका (सोटा) लगभग 2 या 3 फुट लम्बा था। लोग शोकित एवं भयभीत हो उठे कि अब पेट फटने ही वाला है। बाबा अपने स्थान पर दृढ़ हो, उसके अत्यन्त समीप होते जा रहे थे और प्रतिक्षण पेट फटने की आशंका हो रही थी।"
"विजया दशमी के दिन जब लोग सन्ध्या के समय " सीमोल्लंघन' से लौट रहे थे तो बाबा सहसा ही क्रोधित हो गए। सिर पर का कपड़ा, कफनी और लँगोटी निकालकर उन्होंने उसके टुकड़े-टुकड़े करके जलती हुई धूनी में फेंक दिए। वे पूर्ण दिगम्बर खड़े थे और उनकी आँखें अंगारे के समान चमक रही थीं । उन्होंने आवेश में आकर उच्च स्वर में कहा कि "लोगो! यहाँ आओ, मुझे देखकर पूर्ण नि‚चय कर लो कि मैं हिन्दू हूँया मुसलमान।'' सभी भय से काँप रहे थे।"
श्रीसाईं सत्चरित्र में वर्णित उपरोक्त घटनाओं से स्पष्ट है हमारे परमशांत आत्मस्थित श्रीसाईं को बहुत क्रोध आता था. कभी-कभी तो ये क्रोध और बाबा के अपशब्द इतना बढ़ जाते थे की भक्तो को बाबा से संत स्वरुप होने पर संदेह होने लगता था. बाबा क्रोध में अपशब्द कहते और कभी-कभी तो आस-पास रखी वस्तुए उठाकर फेकने लगते थे. मगर आपने देखा होगा की माँ भी कभी-कभी क्रोध में बच्चे को मारती है मगर ये स्वभावगत होता है की माँ की इस मार का बच्चे को हमेशा लाभ ही होता है. बाबा की इन कथाओं से स्पष्ट है की बाबा भी भक्तो के विकारों और दुर्गुणों को दूर करने के लिए उन्हें अपशब्द कहते या दुत्कारते थे.
रामनवमी के अवसर पर बाबा का क्रोध करना स्वाभाविक था क्यंकि इस दिन बाबा भक्तो को दिखाना चाहते थे की उनके अन्दर बसे रावण का संहार करने के लिए ही बाबा यहाँ भक्तो के बीच में आये हैं और रामनवमी का अर्थ भी श्रीसाईं की शिक्षाओं में यही है की रामनवमी के दिन हम अपने मन में, अपने चरित्र में श्रीराम को स्थापित करें और अपने अन्दर के रावण से मुक्ति पायें.
दूसरी घटना शामा के लिए नहीं बल्कि विषधर सर्प के लिए कही गयी थी. साँप का ज़हर धीरे-धीरे शामा के अन्दर चढ़ रहा था और बाबा ने उसे ही लक्ष्य करके उसे नीचे उतरने का आदेश दिया था.
तीसरी घटना स्पष्ट करती है की बाबा का अपने भक्तो से अनन्य प्रेम और अनुराग था. बाबा चाहते थे की भक्त उनकी पूजा अपने मन के अनुसार करें, क्यूंकि जब मन बाबा से जुड़ जायेगा तो मोक्ष प्राप्ति में कोई अवरोध नहीं होगा.
चौथी घटना विशेष रूप से भक्तो को दो बात स्पष्ट करने के लिए थी. पहली तो ये की बाबा को उनके धर्म विशेष से संबोधित करना मूर्खता है और बाबा को ये बिलकुल पसंद नहीं था और दूसरे इस घटना के ठीक एक वर्ष बाद बाबा ने अपनी पावन देह त्याग दी और सदा के लिए भक्तो के ह्रदय में बस गए.
हमारे लिए इन घटनाओं का विशेष महत्त्व ये है की यदि हम बाबा की शिक्षाओं के अनुकूल नहीं रहे तो बाबा एक बार फिर क्रोधित होकर हमे अपना रौद्र रूप दिखा सकते हैं. मेरी तो बाबा से प्रार्थना है की बाबा चाहे दंड देने में लिए ही सही कम से कम हमें एक बार दर्शन तो दो. जय साईं राम.
दियासलाईया इकट्ठी करने वाला संत साईबाबा
बाबा कहाँ हैं? अमीरों के महलो में भी हैं, गरीबो के झोपडो में भी। शिर्डी के विशाल समाधी मंदिर में भी और मुंबई की सड़क के किनारे एक छोटे से चबूतरे पर भी। जो सोचते हैं बाबा को स्वादिष्ट और बढ़िया भोजन पसंद है वो बाबा को पनीर या मखाने की सब्जी और मेवा मिला हलुआ खिलाते हैं तो जिनके खीसे में उनकी दाल रोटी भी मुश्किल से आती है वो बाबा को भाकरी और खिचडी का भोग लगाते हैं। कुछ बाबा को ज़री और सोने की तारो से जडा सिल्क का चोल पहनाते हैं तो कुछ बाबा को एक छोटे से कपडे के टुकड़े से ढकने की कोशिश करते हैं।यहाँ सवाल ये है की क्या आप बता सकते हैं की आखिर इनमे से कौन बाबा को सच्चा प्यार करता है? दोनों ही तरफ के अपने तर्क हैं और अपनी भावनाए। वास्तव में बाबा दोनों ही के दिल में हैं. ना तो अमीर झूठा और ना ही गरीब फरेबी. कुछ साईं मंदिरों में बाबा का शयनकक्ष बनाया गया है जिसमे एअरकंडीशनर तक लगा है और कुछ आस्था के मंदिर ऐसे भी हैं जहाँ बाबा खुले आसमान के नीचे चौबीसों घंटे अपने प्यारे बच्चो के लिए विराजमान हैं. दुनिया में इतना विशाल और विलक्षण व्यक्तित्व श्रीसाईं के अलावा और शायद किसी का नहीं है. बाबा अपने सभी बच्चो को सामान नज़र से देखते हैं और उनका प्यार भी सभी के लिए एक जैसा है. बाबा को ना तो स्वर्ण आभूषनो से जड़े अलंकारों से प्रेम है और ना ही सूती कपडे पहनने में कोई घृणा. बाबा एक निर्विकार और निर्लिप्त पिता के सामान सभी को एक समझते हैं.
बाबा सिर्फ हमारी तरफ देखते हैं और हमारा उद्धार सिर्फ उस इक निगाह से हो जाता है। बाबा को देसी घी में बने हलुए और मिष्ठान भी उतनी ही तृप्ति देते हैं जितना सुख उन्हें खिचडी और भाकरी में मिलता है। अब आप ही बताओ बाबा को हम आखिर दें तो क्या दें? बाबा को सिर्फ हमारा प्यार और समर्पण चाहिए। बाबा को ऐसे भक्तो की भारी भीड़ चाहिए जो उनके दिखाए रास्ते पर चले और उनके दिव्य संदेशो को दुनिया के सभी दुखी और बेसहारा लोगो तक पहुंचाय। बाबा ने श्रीसाईं सत्चरित्र में अपना दिव्य रूप तो दिखाया ही है साथ ही बताया है की वो दियसलाइया इकट्ठी करने वाले एक दिव्य पुरुष हैं। मुझे तो बाबा ऐसे ही दिखाई देते हैं और मेरी बाबा से प्रार्थना है की हमेशा मेरे मन में वही दियासलाईया इकट्ठी करने वाले संत के रूप में विराजमान रहना जिससे मैं भी खुद को अंहकार से वशीभूत होता ना पाऊ। जय साईंराम।
Sunday, March 8, 2009
श्री मुकुल नाग से साईं चर्चा में अमित माथुर
अमित: श्री साईं सत्चरित्र के अनुसार बाबा ने बहुत सी लीलाये की हैं। किसी सज्जन ने तो गड़ना की है श्रीसाईं सत्चरित्र में 64 चमत्कारों का उल्लेख है। आपको बाबा की कौन सी लीला सबसे मनोहर लगती है और क्यूँ?
मुकुलजी: बाबा ने 64 लीलाये नहीं 64 चमत्कार किये हैं ऐसा लिखा है। लीलाओ और चमत्कारों में कुछ भेद है, ऐसा मुझे लगता है।
अमित: कृपया स्पष्ट कीजिये...
मुकुलजी: वास्तव में चमत्कार तो वो हैं जो किसी न किसी प्रकार से विज्ञान के बनाए नीति-नियमो को गलत ठहराते हैं मगर लीलाये वो हैं जो भक्त के मन को पूरी तरह से आंदोलित करके भक्त के मन में परिवर्तन कर देती हैं और भक्त के मन में भगवान् और गुरु को स्थाई रूप से विराजमान कर देती हैं।
अमित: जी, मेरा प्रश्न स्वाभावतः चमत्कारों से है क्यूंकि बाबा की लीलाओ को अच्छा या कमतर आंकना बेवकूफी की बात है।
मुकुलजी (हंसते हुए): हाँ सच कहा बाबा के विषय में बोलते हुए अपने मन-मस्तिष्क को पूरी तरह बाबा के ध्यान में लगाना चाहिए। चलिए अब आपके प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करता हूँ। बाबा से प्रार्थना है की मेरे उत्तर को आपके पाठको के लिए लाभदायक बनाए. बाबा के बहुत से चमत्कारों में केवल बाबा की भक्त परायणता ही दिखाई देती है. बाबा ने कोई भी चमत्कार केवल इसलिए नहीं किया की लोग उस चमत्कार से प्रभावित होंगे, बल्कि ज्यादातर चमत्कार बाबा ने भक्तो को शिक्षा देने के उद्देश्य से किये थे. मुझे बाबा के वो चमत्कार पसंद हैं जहाँ वो शिर्डी से जाने वालो को अपनी मर्ज़ी से आज्ञा देते थे. बाबा की बात ना मानने वाले भक्तो को कष्ट ही उठाना पड़ता था. इसीलिए सच है की 'बाबा को मानो और बाबा की मानो'.
अमित: बाबा के भक्तो में सबसे प्रिये भक्त आपको कौन लगता है? बाबा को तो सभी भक्त प्रिये थे मगर आपको श्रीसाई लीलापुरुषोत्तम का कौन सा भक्त सबसे अच्छा लगता है?
मुकुलजी: वैसे तो सभी भक्त अपने-अपने स्थान पर बाबा के संदेशो और शिक्षाओं को सामने लाते हैं मगर मुझे श्यामा गुरूजी सबसे अधिक पसंद हैं। इसका सबसे बड़ा कारण तो ये है की सदगुरु के चरणों में ये गुरु सदा झुकते रहे और साथ ही साथ बाबा से सबसे अधिक तर्क-वितर्क भी श्यामा गुरूजी ही किया करते थे। मुझे याद आता है स्वामी रामकृष्णा परमहंस ने कहा था की शिष्यों का अधिकार है की वो अपने गुरु को अच्छी तरह से ठोक-बजा कर देख लें और जब सब कुछ सही लगे तब अपना सर्वस्व उस गुरु के चरणों में अर्पित कर दें. श्यामा गुरूजी भी इसी प्रकार बाबा के द्वारा होने वाली लीलाओ का कारण पूछकर प्यासे भक्तो को ज्ञान रुपी शिक्षाओं का पान करवाते थे. यही कारण है की मुझे श्यामा गुरूजी सबसे अधिक पसंद हैं.
अमित: बाबा ने अध्याय 49 में नानासाहेब चांदोरकर को मन पर लगाम रखने और इन्द्रियों को लम्पट होने से रोकने पर बल दिया है। आज के समय में क्या संभव है?
मुकुलजी: बिलकुल नहीं, मेरे विचार से बाबा की किसी भी शिक्षा में उसे अक्षरक्ष पालन करने को कहा हो ऐसा नहीं है। आज के समय में जब हमारे आस-पास का सारा संसार लम्पट हो रहा है तो हमारे लिए साधू बने रहना बिलकुल भी संभव नहीं है। मगर वहीँ आपने ध्यान दिया हो तो ऐसा कहा गया है की आप सुन्दरता को क्या सोचकर देखें. मन को लम्पट न होने देने का एक साधन तो यही है की आप किसी की सुन्दरता में वासना नहीं बल्कि परमपिता परमेश्वर की रचना का दर्शन करें. आप सुन्दर युवती या युवक को देखकर परमेश्वर को शुक्रिया करें की हे परमेश्वर तूने कितनी सुन्दर रचना की है. मन में वासनात्मक विचारों को ना आने दें. प्रत्येक स्थिति में सामान्य रहे.
अमित: मेरा अनुभव है की बाबा से जुड़ने और बाबा का अत्यधिक ध्यान करने पर हमारी मनःस्थिति बदल जाती है। हमारी सोच और ध्यान इस जग से हटने लगता है इसे रोकने का कोई तरीका आपके पास है?
मुकुलजी: पहले तो ये बताओ की बाबा के विचारो और शिक्षाओं की गंगा में बहने से खुद को रोकना ही क्यूँ है?
अमित: क्यूंकि बाबा के विचारो में रहने के कारण हमारा सामाजिक और पारिवारिक जीवन व्यवस्थित नहीं रहता...
मुकुलजी: हाँ, ये बात किसी हद तक सच है। जब आप बाबा के और उनकी लीलाओ के और उनके ध्यान में खोने लगते हैं तो पारिवारिक और सामाजिक जीवन जहाँ झूट बोलना, छल करना, गलत सोचना एक स्वाभाविक क्रिया है, प्रभावित होता है. मगर मेरे विचार से इस व्यवस्था का सञ्चालन करने का कार्य भी हमें बाबा को ही सौंप देना चाहिए. मैंने बहुत से साईं भक्तो को देखा है जो बाबा के ही ध्यान में डूबे रहते हैं मगर आप उन्हें कभी उनके कार्य स्थान पर देखिये, शायद आपको लगेगा की ये 'साईं भक्त' होने का ढोंग कर रहे हैं मगर वो बाबा के द्वारा संचालित क्रिया है जिससे वो यहाँ भी हैं और वहां भी.
अमित: मुकुल भैया, आपका बहुत बहुत धन्यवाद हमसे बातें करने के लिए। मैं बाबा से प्रार्थना करूँगा की आपकी इस चर्चा से साईं भक्तो को अध्यात्मिक लाभ प्राप्त हो। जय साईं राम.
मुकुलजी: जय साईं राम, मालिक आप सबका भला करे.
