Saturday, January 16, 2010

बाबा का न्यायालय: चिंचनिकर चावडी

"मशीद माई से कोई खाली हाथ नहीं लौटता" ये वचन जितने तब सत्य थे उतने बल्कि उससे कहीं ज्यादा आज सार्थक हैं। "मेरी शरण आ खाली जाए, हो कोई तो मुझे बताये" बाबा के साभी वचन आज भी बाबा की संतानों में जीवन के प्रति जोश पैदा कर रहे हैं और एक सतत आश्वासन हैं की बाबा से कुछ भी मांगो वो ज़रूर देते हैं.
लगभग 36,525 दिन पहले बाबा ने द्वारकामाई के अलावा एक और जगह को अपना ठिकाना बनाया था। बाबा ने फैसला किया किया की वो एक दिन छोड़कर पास ही में एक टूटी सी ईमारत में रात को विश्राम करेंगे. द्वारकामाई में तात्या और म्हाल्सपतिजी बाबा के साथ रात को चिंतन, मनन, ध्यान और थोडा सा विश्राम करते थे मगर चावडी में किसी को भी बाबा के साथ रुकने की आज्ञा नहीं थी. बाबा चावडी में ध्यान भी करते और अपने भक्तो के लिए मालिक से प्रार्थना भी करते. चावडी में बाबा को छोड़ने के बाद शिर्डी के किसी भी व्यक्ति ने बाबा की आवाज़ नहीं सुनी. बाबा चावडी में केवल ध्यान ही किया करते थे? बाबा का चावडी में सोने का क्या कारण था? चावडी में महिलाओं का प्रवेश वर्जित क्यूँ था? वैसे तो बाबा की लीला बाबा ही जानें मगर बाबा की ही कृपा और करुणा से हम बाबा की इस मनमोहक लीला को समझने का प्रयास करते हैं.
बाबा हर दुसरे दिन चावडी में रात बिताते थे. बाबा की दया से जहाँ तक मेरा विचार है वास्तव में चावडी बाबा का न्यायालय थी. द्वारकामाई में बाबा हर उस आने वाले की इच्छा पूरी करते थे जो उनसे कुछ मांगता था, तो बाबा ने ऐसा क्यूँ कहा की "अगर सभी बौर बन जाएँ तो फलो की गिनती करना ही असंभव हो जाएगा." यानि बाबा सबको देने का सामर्थ्य रखते हुए भी सुपात्र का विचार ज़रूर करते थे. द्वारकामाई में जब भक्तो को दे देते थे तब चावडी में बैठकर उस भक्त को अपनी दी हुयी भेंट के लिए सुपात्र बनाने का कार्य भी करते थे. एक वर्णन आता है जहाँ बाबा ने अपने एक भक्त की शराब की बुरी आदत छुडवाने के लिए उसे बहुत मारा था, वो मारना स्वप्न में ज़रूर था मगर उसका असर वास्तविक था.आज भी अगर हम बाबा से कुछ मांगते हैं तो हो सकता है हम अपनी मांगी हुयी चीज़ के लिए सुपात्र ना हों, लेकिन बाबा आज भी चावडी में बैठकर हमे, हमारी मांग के लिए हमे सुपात्र बनाते हैं. बाबा ने कहा है "श्रद्धा रखो और सब्र से काम लो". अगर बाबा ने हमे देना ही है तो सब्र किस बात का? वास्तव में बाबा ने सब्र करने को इसीलिए कहा है की वो चाहते हैं की हम बौर की तरह पूरी श्रद्धा और सब्र से इंतज़ार करें जिससे हमे हमारे कर्मो का स्वादिष्ट और सुगन्धित फल मिले. चावडी में बैठकर बाबा का न्यायालय पूरा न्याय करता है अगर दोष हम में है तो सजा भी हमे ही भुगतनी होगी और बाबा ने तो साफ़ बताया है की कई जन्मो में सजा पूरी करने से अच्छा है की हम इसी जन्म में बाबा की निगरानी में अपनी सजा पूरी करें और फिर स्वयं बाबा के चरणों में विलीन हो जाएँ.मेरे विचार से आप कितना इत्तेफाक रखते हैं ये तो मैं नहीं जानता मगर मुझे यकीन है आज भी चावडी में बाबा से अपने किये तमाम गुनाहों की माफ़ी मांग लेने से बाबा हमे मालिक से इन्साफ दिलाते हैं और हमे गलती करने से रोक भी लेते हैं. बाबा की चावडी में बाबा का दरबार भले ही ना लगता हो मगर फैसला तो बाबा चावडी में बैठकर ही सुनाते हैं. तो हम ये मान सकते हैं की मशीदमाई हमें कभी निराश नहीं करती. मशीदमाई का साईं हमें देता है मगर चावडी में बैठकर हमारी समीक्षा और समाधान करने के बाद देता है. श्रीसाईं के इस न्यायालय को फैसले देते सौ साल दिसंबर 2009 में पूरे हो जायेंगे और शायद ये सृष्टि का एकमात्र न्यायालय होगा जिसके फैसले कभी गलत नहीं होते. बाबा के इस न्यायालय को इस लौकिक जगत के सौ साल पूरे होने पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें. जय साईंराम.

Thursday, January 14, 2010

आइये जानें कौन थे हेमाद्रीपन्त?

बाबा ने गोविन्द रघुनाथ दाभोलकर को अन्तः प्रेरणा देकर अपना पावन जीवन चरित लिखवाया जिसे आज साईं समाज में श्रीसाईं सत्चरित्र के नाम से पूजा और माना जाता है. बाबा की लीला में छिपे अर्थ और व्यापकता को बाबा के अतिरिक्त कोई नहीं जानता. बाबा ने दाभोलकर जी को हेमाडपंत कहा, आइये आज हम उन्ही हेमाद्रिपंत की चर्चा करते हैं जो महाराष्ट्र के एक प्रसिद्द विद्वान हुए हैं।

तेरहवी शताब्दी में कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ के एक छोटे से ग्राम हेमाद्री के स्मार्त ऋग्वेदी, वत्स गोत्री, शाकालशक्शी कर्हाड़े ब्राह्मण परिवार में जन्मे हेमाद्रिपंत को उनके पिता कामदेओ बहुत छोटी उम्र में महाराष्ट्र ले आये थे.

दक्षिणपश्चिम भारतवर्ष के यादव शासन काल में प्रधानमन्त्री के महत्त्वपूर्ण पद पर रहते हुए हेमाद्रिपंत स्वयं में एक कुशल प्रशासक, वास्तुकार, कवि और आध्यात्म्विद रहे हैं. हेमाद्रिपंत के प्रधानमंत्रीत्व में यादवकुल का सूर्य अपने चरम पर था और इनके बाद पठान बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली और भारत पर कब्ज़ा कर लिया.

हेमाद्रिपंत ने बहुत-सी धार्मिक पुस्तकें लिखीं जिनमे चतुर्वर्ग चिंतामणि है जिसमे हज़ारों व्रतों और उनके करने के विधान का वर्णन है. चिकित्सा के सम्बन्ध में इन्होने आयुर्वेद रहस्यं पुस्तक लिखी जिसने हजारो बीमारियो और उनके निदान के बारे में लिखा गया है।

इन्होने एक इतिहासिक पुस्तक भी लिखी जिसका नाम हेमाद्पंती बखर है. हेमाद्रिपंत ने प्रशासन और राजकीय कार्यो में एकरूपता लाने के लिए एक पुस्तक भी लिखी जिसमे राज-काज के दैनिंदिन कार्यो की प्रक्रिया को विस्तार से निश्चित किया गया है।

हेमाद्रिपंत ने मोदी लिपि को सरकारी पत्रव्यवहार की भाषा बनाया. गोंदेश्वर मंदिर, तुलजा भवानी और अनुधा नागनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर और रत्नागढ़ के अमृतेश्वर मंदिर को हेमदपंथी वास्तुकारिता से बनाया गया है जिसका सृजन हेमाद्र्पंत ने किया था

हेमाद्रिपंत ने भारत में बाजरे के पौधे, जिसे कन्नड़ में सज्जे, तमिल में कम्बू, तेलुगु में सज्जालू, मराठी में बाजरी और उर्दू, पंजाबी या हिंदी में बाजरा कहा जाता है, को बहुत प्रोत्साहन दिया. महाराष्ट्र में महालक्ष्मी के पूजन को प्रोत्साहित और वैभवशाली बनाने में भी हेमाद्रिपंत का बहुत योगदान है.

विकिपेडिया नाम की वेबसाइट से प्राप्त इस जानकारी के आधार पर हम समझ सकते हैं की श्रीसाईं का ज्ञान और व्यापकता कितनी विस्तृत थी की श्री गोविन्द रघुनाथ दाभोलकर जी को बाबा ने तेरहवी सदी के इस महान विद्वान के नाम से सुशोभित किया. धन्य हैं श्रीसाईं.

Saturday, August 29, 2009

ये गर्व भरा मस्तक मेरा...

जब मैंने ये भजन सुना बहुत अच्छा लगा. लगा मेरे अन्दर का सारा अंहकार नष्ट हो रहा है. ये गर्व भरा मस्तक मेरा, सचमुच हर कोई गर्व कर रहा है. किसी को धन का नशा है, किसी को मान का नशा, किसी को ताक़त का नशा है और किसी को ज्ञान का नशा. गर्व हर किसी को है और उस बात पर है जिसपर नहीं होना चाहिए. कवि ने बहुत सुन्दर अंतःप्रेरणा से लिखा है की हे प्रभु! ये गर्व भरा मस्तक अपने चरणों की धुल तक झुकने दे क्यूंकि अगर तूने इस मस्तक को अपने चरणों में कुबूल कर लिया तो मेरे आस्तित्व की सार्थकता सिद्ध होगी वर्ना तो अभी कई जन्मो तक यहाँ रगड़ना पड़ेगा. हे प्रभु! इस अंहकार और विकार से भरे हुए मन को अब बस एक ही काम करने की आज्ञा दे, बस आर्शीवाद दे की ये मन निज नाम अर्थात तेरे नाम की माला जपता रहे. ये गर्व भरा मस्तक मेरा, प्रभु चरण धूल तक झुकने दे / अंहकार विकार भरे मन को, निज नाम की माला जपने दे.

हे मालिक! मेरे मन में बहुत मैल है. इस दुनिया के विकारों और विचारों ने मेरे मन में बहुत मैल जमा कर दिया है. मेरे मन पर तेरी छाप तो है, मेरे मन के दर्पण में तो सिर्फ तेरा ही अक्स दीखता है मगर इस मैल की वजह से सब छुप गया है. अब अगर इस मैल को धो डालू तो ये जीवन अपने आप तेरे चरणों में अर्पित हो जाएगा. मालिक कुछ ऐसा कर की मैं अपने मन के मैल को धो दूं और ये जीवन तेरा कर दूं. हे प्रभु! मैं तुम्हारा प्रेमी हूँ मुझे तुम्हारे नाम से तुम्हारे धाम से और तुम्हारी यादो से बहुत प्यार है. हे प्राणाधार! अब मुझे इतना का झुका की तेरे सामने खडा होकर इतना शर्मिंदा रहू की फिर उठ ही ना सकू. कवि कहता है की मैं मन के मैल को धो ना सका / ये जीवन तेरा हो ना सका / मैं प्रेमी हूँ, इतना ना झुका / गिर भी जो पडू तो उठने दे.

पता नहीं क्यूँ ज्ञानी और महात्मा संतो ने मुझे अपने चंगुल में फंसा लिया. मुझे ज्ञान और शास्त्र की इतनी बातें बताई की मैं ठेठ भाग्यवादी हो गया. सब कुछ मैंने भाग्य के भरोसे छोड़कर अपने सभी सांसारिक और धार्मिक कर्मो का त्याग कर दिया. मैं गफलत की ऐसी नींद में सो गया की मुझे कुछ भी दिखना और समझना बंद हो गया. मुझे तेरे बारे में ज्ञान तो बहुत दिया गया मगर वास्तव में मैं तुझसे दूर हो गया. अब तेरी ही कृपा से मेरी आँखें खुली हैं. अब जो देखता हूँ तो मुझे रोना आ जाता है. मुझे दुःख होता है की मैंने ये क्या अनर्थ कर दिया. हे प्रभु! अब ये जग चाहे तो सोता रहे मगर मुझे और मेरे अंतर्मन को अपने ज्ञान और वैराग्य की ज्योत से जगा दो. कवि बहुत सुन्दरता से कहता है मैं ज्ञान की बातों में खोया / और कर्महीन पड़कर सोया / जब आँख खुली तो मन रोया / जग सोये मुझको जागने दे.

हे कृपानिधान! तूने मुझे बनाया है तो अब मैं चाहे जैसा भी हूँ. दुनिया के बीच रहकर अपने नाम और प्रतिष्ठा के लिए मेरा मोह बहुत है. मैं सबके काम करता हूँ जिस से सब मुझे नाम दें और मेरे जयजयकार करें. हे साईं! अब मैं जैसा भी हूँ खोटा, या खरा इसको मत देख. हे नानक! देख न लेख मेरे माथे पे, मेरे कर्मो पर मत जा (वेख न लेख मत्थे ते मेरे, करमा ते ना जावी), हे प्रभु! अब तो मैं तेरी शरण में आ गया हूँ. तेरी शरण और तेरे चरण तो माँ के प्रेम की तरह निर्दोष हैं साईं, अब तू या तो एक बार कहदे "खाली जा" या फिर अपने प्यार की बरसात मुझे पर होने दे और इस कृपा की वर्षा में मुझे बह जाने दे. कवि ने अंतिम पद में बहुत सुन्दरता से शरणागत होते हुए लिखा है जैसा हूँ मैं, खोटा या खरा / निर्दोष शरण में आ तो गया / इक बार ये कह दे खाली जा / या प्रीत की रीत छलकने दे.

ये गर्व भरा मस्तक मेरा
प्रभु चरण धूल तक झुकने दे
अंहकार विकार भरे मन को
निज नाम की माला जपने दे

मैं मन के मैल को धो ना सका
ये जीवन तेरा हो ना सका
मैं प्रेमी हूँ, इतना ना झुका
गिर भी जो पडू तो उठने दे.
ये गर्व भरा मस्तक मेरा
प्रभु चरण धूल तक झुकने दे

मैं ज्ञान की बातों में खोया
और कर्महीन पड़कर सोया
जब आँख खुली तो मन रोया
जग सोये मुझको जागने दे.
ये गर्व भरा मस्तक मेरा
प्रभु चरण धूल तक झुकने दे

जैसा हूँ मैं, खोटा या खरा
निर्दोष शरण में आ तो गया
इक बार ये कह दे खाली जा
या प्रीत की रीत छलकने दे.
ये गर्व भरा मस्तक मेरा
प्रभु चरण धूल तक झुकने दे

Saturday, July 25, 2009

श्रद्धा और सबूरी - भाग दो



ॐ साईराम, आज हम बात करते हैं श्रद्धा के विषय में आखिर श्रद्धा है तो क्या है? श्रद्धा किस चीज़ से जुडी है? कभी सोचा है आपने की ऐसा क्यूँ होता है जब आपके ईष्ट, आपके भगवान्, आपके साईं, आपके सामने होते हैं तो आपका मन आपकी भावनाए आपके बाबा को उसी तरह देखेंगी. अगर आपको गर्मी लग रही है आपको पसीना आ रहा है तो आपको लगेगा आपके बाबा को पसीना आ रहा है, बाबा को भी गर्मी लग रही है. अगर आपको लगेगा की सर्दियों में ठण्ड हो रही है आपको ठण्ड लग रही है आपको कोई कम्बल कोई स्वेटर ले लेना चाहिए तो आपको लगेगा की आपको बाबा को भी कम्बल ओढ़ाना चाहिए, रजाई ओढा देनी चाहिए क्यूंकि बाबा को भी ठण्ड लग रही है. बाबा ने तो कभी आपसे आके नहीं कहा, बाबा तो फकीर थे बाबा को तो ठण्ड लगेगी तो भी वही भाव और गर्मी लगेगी तो भी वही भाव. तो फिर ऐसा क्या है जो बाबा को और आपको जोड़ रहा है? हम कहते हैं की वो श्रद्धा है, बाबा के लिए हमारी श्रद्धा है जो हमें बाबा को मानवीय रूप में देखने पर मजबूर कर देती है और हमें ये आश्वासन देती है की बाबा हमारे साथ सशरीर मोजूद हैं. मगर श्रद्धा बिना भावना के नहीं होती. श्रद्धा कोई मेकेनिकल चीज़ नहीं है, श्रद्धा कोई तंत्र नहीं है, श्रद्धा कोई मन्त्र भी नहीं है. वास्तव में श्रद्धा भावना है. हमारे मन में, हमारे अंतःकरण में एक भावना छिपी है, हमारे बाबा के लिए. एक प्रेम है, एक अनुभूति है, आप उसे बयान नहीं कर सकते. कोई भी बयान नहीं कर सकता. प्रेम की परिभाषाए कई दी जा सकती हैं मगर प्रेम को बयान नहीं किया जा सकता. आप ये नहीं कह सकते की मेरा प्रेम अधिक है और दूसरे का प्रेम कम है, तो आप श्रद्धा को कैसे आंकेंगे? हम कहते हैं पैसेवाले हैं बहुत पैसा खर्च करते हैं तो इनमे कुछ अधिक श्रद्धा है या कुछ कहते हैं इनमे श्रद्धा नहीं है ये दिखावा है, पर ऐसा नहीं है. जो पैसा खर्च कर रहा है उसमे भी श्रद्धा है, जो पैसा नहीं खर्च कर रहा है केवल भावना से प्रणाम कर रहा है बाबा को उसमे भी श्रद्धा है. अंतर क्या है? अंतर ये है की जिस पर पैसा है वो उस श्रद्धा को प्रकट करने के लिए उस धन का प्रयोग कर रहा है. जिसमे भावनाय अधिक हैं वो भावनाओं का प्रयोग कर रहा है एक गरीब आदमी पांच हज़ार रूपए कमाता है और उसका दस प्रतिशत पांच सौ रूपए वो बाबा को दे देता है, एक अमीर जो पचास लाख रूपए कमाता है अगर पांच हज़ार, पचास हज़ार दे भी दे तो उसके खजाने में फर्क नहीं पड़ेगा. श्रद्धा, भावनाय ये धन की भूखी नहीं हैं.
तो मित्रो, श्रद्धा क्या है? श्रद्धा भावना है, और सबूरी उसका संबल है उसको रोकने के लिए. क्यूँ की भावनाय तो विचलित होती हैं और मानव की भावनाय सबसे ज्यादा विचलित होती हैं. मानव की भावनाय उसके आस-पास के क्षेत्र, उसकी आवश्यकता और ज़रुरत के हिसाब से बदलती रहती हैं. जब आपको लगेगा की कोई बहुत अच्छा आपके लिए कर रहा है, कोई भगवान् आपके लिए बहुत अच्छा कर रहा है तो आपको भावना उसके प्रति अलग होगी लेकिन जब आपको लगेगा की कुछ नहीं हो रहा है तो आपकी भावना अलग होगी. तो भावनाय विचलित होती रहती हैं. इसीलिए उनपर अंकुश लगाने की ज़रुरत है और बाबा ने वही अंकुश दिया सबूरी. बाबा ने सबूरी का अंकुश जो दिया वो इसलिए दिया की बाबा जानते थे की भावनाओं से श्रद्धा जुडी है और श्रद्धा विचलित हो जायेगी इसीलिए बाबा ने सबूरी का विषय दिया. तो श्रद्धा और सबूरी वास्तव में भावनाय हैं और भावनाओं के अतिरिक्त कुछ नहीं. ॐ साईराम.

Wednesday, June 17, 2009

मानसिक चिकित्सा है श्रद्धा और सबूरी

श्रीसाईं के दिव्य संदेशो में श्रद्धा और सबूरी अपना विशेष स्थान रखते हैं. आजतक बहुत से ज्ञानीजनों ने श्रद्धा-सबूरी को कई विभिन्न दृष्टियों से प्रस्तुत किया है. मेरे विचार में सभी का कहना सही भी है और एक विचार मेरे मन में भी उठता है की वास्तव में बाबा का श्रद्धा-सबूरी का दिव्य सन्देश एक मानसिक चिकित्सा या कहें की मनोचिकित्सा का एक स्वरुप है.

बाबा के पास पहुँचने वाले ज़्यादातर लोग अपनी ज़िन्दगी और ज़िन्दगी में हो रही मुश्किलों से परेशान होते हैं. बाबा से हर कोई आशा लेकर पहुंचता है की बाबा उसकी ज़िन्दगी में सब कुछ अच्छा कर देंगे. जिस प्रकार कोई परेशान और दुखी व्यक्ति ज्योतिषी के पास पहुंचता है और ज्योतिषी उसे कोई नग पहनने की सलाह देता है. ये नग उस व्यक्ति के जीवन में आशा और विश्वास का संचार कर देता है. प्रसिद्द ज्योतिषाचार्य प्रोफेसर दयानंद के अनुसार "अधिकतर रोग चिकित्सा से नहीं बल्कि उस चिकित्सा में विश्वास से अच्छे होते हैं और यही ज्योतिष के साथ होता है. हर किसी की ज़िन्दगी में परेशानी और दुःख का एक नियत समय होता है. एक समय के बाद रोग ये परेशानिया और दुःख खुद-ब-खुद दूर हो जाते हैं मगर इस सफ़र को तय करने में ज्योतिषीय उपाय और नग बहुत सहारा देते हैं. नग पहन कर व्यक्ति सदा स्मरण रखता है की ये नग उसे उजाले की ओर ले जा रहा है." ठीक इसी प्रकार श्रीसाईं का कहा श्रद्धा-सबूरी का मन्त्र भी निराशा से आशा और अँधेरे से उजाले की तरफ एक यात्रा है.

बाबा ने कहा "श्रद्धा रख सब्र से काम ले अल्लाह भला करेगा." ये विशवास और आश्वासन हमेशा से भक्तो के लिए एक उजाले की किरण बनता रहा है. धुपखेडा गाँव के चाँद पाटिल से लेकर आज तक जिसने भी अपने मन में ये श्रीसाईं के इन दो शब्दों को बसा लिया उसका पूरी दुनिया तो क्या स्वयं प्रारब्ध या कहें की 'होनी' भी कुछ नहीं बिगाड़ सकती. सिर्फ एक अटल विश्वाश और अडिग यकीन आपको सारी मुसीबतों और तकलीफों के पार ले जा सकता है.

बहुत से भक्तो को बाबा ले श्रद्धा-सबूरी का मतलब आज भी स्पष्ट नहीं है. वास्तव में बाबा ने कहा था की अपने ईष्ट, अपने गुरु, अपने मालिक पर श्रद्धा रखो. ये विश्वास रखो की भवसागर को पार अगर कोई करा सकता है तो वो आपका ईष्ट, गुरु, और मालिक है. अपने मालिक की बातों को ध्यान से सुनो और उनका अक्षरक्ष पालन करो. बाबा को पता था की केवल किसी पर विश्वास रखना हो काफी नहीं है. विश्वास की डूबती-उतरती नाव का कोई भरोसा नहीं है इसीलिए बाबा ने इस पर सबूरी का लंगर डाल दिया था. किसी पर विश्वास करना है और इस हद तक करना है की कोई उस विश्वास को डिगा ना सके चाहे कितने ही साल और जनम लगें. जैसा की पहले हमने बताया दुःख दूर होना है और होगा मगर उस समय तक पहुँचने के लिए एक सहारा चाहिए और वो सहारा है श्रद्धा और सबूरी.

Sunday, May 31, 2009

बाबा ने त्रिपुन्ड लगाने से भी मना किया था.


पिछले अंक में हमने देखा था कि बाबा ने द्वारकामाई मशीद के जीर्णोद्दार को रोकने का प्रयास किया था. इसके पीछे शायद बाबा का सन्देश था की मेरे लिए भव्य देवालयों के निर्माण कि कोई आवश्यकता नहीं है. मगर भक्तो के प्रेमवश करुणावतार श्रीसाईं ने द्वारकामाई के जीर्णोद्धार की आज्ञा दे दी. इसी प्रकार बाबा ने अपने मस्तक पर त्रिपुंड यानी महादेव के सामान तीन लकीरों वाले तिलक कि आज्ञा भी किसी को नहीं दी थी. श्रीसाईं सत्चरित्र में वर्णन है की कैसे और किस भक्त को सबसे पहले त्रिपुंड लगाने की आज्ञा मिली. लीजिये श्रीसाईं कथा का श्रवण कीजिये.

"एक बार श्री तात्या नूलकर के मित्र डॉक्टर पंडित बाबा के दर्शनार्थ शिरड़ी पधारे। बाबा को प्रणाम कर वे मस्जिद में कुछ देर तक बैठे। बाबा ने उन्हें श्री दादा भट केलकर के पास भेजा, जहाँ पर उनका अच्छा स्वागत हुआ। फिर दादा भट और डॉ. पंडित एक साथ पूजन के लिए मस्जिद पहुँचे। दादा भट ने बाबा का पूजन किया। बाबा का पूजन तो प्राय: सभी किया करते थे, परन्तु अभी तक उनके शुभ मस्तक पर चन्दन लगाने का किसी ने भी साहस नहीं किया था। केवल एक म्हालसापति ही उनके गले में चन्दन लगाया करते थे। डॉ. पंडित ने पूजन की थाली में से चन्दन लेकर बाबा के मस्तक पर त्रिपुण्डाकार लगाया। लोगों ने महान् आर्श्चय से देखा कि बाबा ने एक शब्द भी नहीं कहा। सन्ध्या समय दादा भट ने बाबा से पूछा, "क्या कारण है कि आप दूसरों को तो मस्तक पर चन्दन नहीं लगाने देते, परन्तु डॉ. पंडित को आपने कुछ भी नहीं कहा?'' बाबा कहने लगे," डॉ. पंडित ने मुझे अपने गुरु श्री रघुनाथ महाराज धोपेश्वरकर, जो कि काका पुराणिक के नाम से प्रसिद्ध हैं, के ही समान समझा और अपने गुरु को वे जिस प्रकार चन्दन लगाते थे, उसी भावना से उन्होंने मुझे चन्दन लगाया। तब मैं कैसे रोक सकता था?'' पूछने पर डाँ. पंडित ने दादा भट से कहा कि मैंने बाबा को अपने गुरु काका पुराणिक के समान ही जानकर उन्हें त्रिपुण्डाकार चन्दन लगाया है, जिस प्रकार मैं अपने गुरु को सदैव लगाया करता था।"

इसके पश्चात मेघा बाबा को महादेव का अवतार समझकर उनके पावन विशाल मस्तक पर त्रिपुंड लगाया करते थे. आज हम चर्चा करेंगे की बाबा ने त्रिपुंड लगाने की आज्ञा भक्तो को क्यूँ नहीं दी थी? यहाँ मैं स्पष्ट कर दू ये विचार मेरे खुद के मन में उठ रहे हैं और मैं किसी भी परंपरा या मज़हब के विरुद्ध नहीं हूँ.

बाबा हमेशा से इस बात का विरोध करते रहे की उनके धर्म और जन्म के विषय में कोई प्रश्न करे. वास्तव में संत और महात्मा किसी भी धर्म या जाति विशेष के नहीं होते. संत को काम होता है समाज को मोह से ऊपर उठाकर परमपिता की सेवा और राह में लगाना. जहाँ तक सनातन धर्म का सम्बन्ध है तो सनातन धर्म का तो लक्ष्य ही मोक्ष की प्राप्ति है. मोक्ष वो है जो धर्म से ऊपर है. मोक्ष वो है जिसके लिए समाज और मानव के बनाय कोई भी बंधन मान्य नहीं हैं. इसी प्रकार बाबा जो स्वयं मोक्षदाता हैं अपनी इस लीला के द्वारा भक्तो को सन्देश देते हैं की उन्हें किसी भी धर्म विशेष से ना जोड़ा जाए. मगर यहाँ भी बाबा भक्तो के प्रेम से वशीभूत होकर डॉक्टर पंडित को त्रिपुंड की आज्ञा दे देते हैं.

आज शिर्डी जाने वालो को महसूस होता है की शायद श्रीसाईं बाबा कोई हिन्दू संत थे. बाबा की चार आरतिया होती हैं, बाबा का मंगलस्नान होता है, बाबा को भोग लगता है, रामनवमी-गुरु पूर्णिमा-दशहरा माने जाते हैं मगर रामनवमी के साथ उर्स का जो आरम्भ हुआ था वो नादाराद है, चन्दन उत्सव की कोई चर्चा नहीं होती, यहाँ तक कि इसलाम या दुसरे धर्मो का आस-पास कहीं भी चिन्ह नहीं है. द्वारकामाई मशीद में आज भी एक 'आला' है जहाँ मुसलमान नमाज़ पढ़ते हैं, मगर अजान कि कोई आवाज़ नहीं होती. बाबा ने तो शिक्षा दी है है कि सब धर्मो का सम्मान करो मगर ईद और बड़ा दिन (क्रिसमस) जैसे मुख्य गैर-हिन्दू त्यौहार आज शिर्डी में नहीं माने जाते.

बाबा के समय में भी रामलाल पंजाबी के अतिरिक्त किसी सिख भक्त वर्णन श्रीसाईं सत्चरित्र में नहीं है और सिर्फ पंजाबी लिखा होने से ही वो सिख हैं ऐसा नहीं माना जा सकता. 1918 में बाबा का भौगोलिक क्षेत्र बहुत सीमित था. बाबा के स्वयं सशरीर विचरण का स्थान नीम गाँव और रहाता तक था मगर बाबा त्रिकालज्ञ थे उन्हें दुनिया में हो रही सब घटनाओं का पूर्ण ज्ञान था. मेरे विचार से हमे श्रीसाईं बाबा और उनकी लीलाओं को और प्रेमपूर्वक समझने की आवश्यकता है. हमें बाबा से प्रार्थना करनी चाहिए की 'हे! प्रेम, दया, करुणा, और कृपा की साक्षात् मूर्ती, हमें शक्ति और विवेक दो की हम आपकी लीलाओ में छिपे आपके सन्देश को समझ सकें.' जय साईंराम

साईं भक्ति में अमीर खुसरो


जय साईराम, आप भी ये सोचकर हैरान हो रहे होंगे की आखिर अमीर खुसरू का साईं भक्ति या साईबाबा से क्या वास्ता है? वैसे तो श्रीसाईं सत्चरित्र में ये बात दावे से कही गयी है की सभी संत, पीर-फकीर, औलिया एक ही नूर और एक ही मालिक के मुरीद होते हैं और इन सबका एक आध्यात्मिक रिश्ता होता है. 1886 में जब बाबा ने बहत्तर घंटे की समाधी ली थी तब बंगाल में स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी ने देहत्याग किया था और बाबा उन्ही से मिलने गए थे ऐसा माना जाता है. जिस तरह बाबा का सम्बन्ध एक बंगाली गुरु स्वामी रामकृष्णा परमहंस से था या बाबा का सम्बन्ध एक पीर हजरत मानिक प्रभु से था या बाबा का रिश्ता अक्कलकोट के स्वामी समर्थ से था उसी कड़ी में हम ये कह सकते हैं की बाबा का सम्बन्ध हजरत निजामुद्दीन औलिया से भी था. ये सही है की हजरत निजामुद्दीन औलिया का शारीरिक जीवनकाल 1238 - 1325 ईसवी का था मगर साईंबाबा तो चिरंतन और अयोनिज हैं. अयोनिज वो होता है जिसका जन्म माता के शरीर से नहीं होता. इसी प्रकार संत कबीर को भी अयोनिज माना जाता है. कबीर भी एक जुलाहे को जंगल में मिले थे और बाबा को भी शिर्डी के लोगो ने 1854 में एक नीम के पेड़ के नीचे बैठे पाया था. आइये अब चर्चा करें की साईं भक्ति में अमीर खुसरू क्या हैं?

अमीर खुसरू (1253-1325 ईसवी) का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जो चगेज़ खान के समय में पटियाला, हिंदुस्तान में आकर बसे थे. सिर्फ आठ साल की उम्र में अमीर खुसरू के पिता उन्हें हजरत निजामुद्दीन औलिया महबूब-ए-इलाही से मिलवाने ले गए. वहां पहुँच कर अमीर खुसरू के पिता तो अन्दर चले गए मगर खुसरू बहार ही रुक गए. खुसरू ने सोचा की मैं कुछ शेर लिखकर अन्दर भेजता हूँ, अगर हजरत निजाम ने मुझे उनका जवाब दे दिया और अन्दर बुला लिया हो ही मैं अन्दर जाऊँगा. अभी खुसरू ने दो शेर ही लिखे थे की अन्दर से एक खादिम आया और खुसरू के हाथ में एक कागज़ थमा दिया और बोला हजरत ने आपको अन्दर बुलाया है. अमीर खुसरू ने देखा की उस कागज़ में उनके लिखे दोनों शेरो का जवाब था. खुसरू ने उसी वक़्त अल्लाह का शुक्रिया अदा किया और हजरत निजामुद्दीन औलिया महबूब-ए-इलाही के जानशीन मुरीद हो गए. इसके बाद हजरत अमीर खुसरू के तमाम कलाम और शेर हजरत निजामुद्दीन औलिया के चरणों में समर्पित हो गए. इसके बाद उनका और हजरत का गुरु-शिष्य का वो रिश्ता बना की हजरत निजामुद्दीन औलिया ने यहाँ तक कहा की अगर अमीर खुसरू उनके साथ अल्लाह के दरबार में नहीं जायेगे तो उनका कदम भी जन्नत में नहीं पड़ेगा. हजरत निजाम का ही कहना था की अगर इस्लाम में दो इंसानों को एक कब्र में दफन करने की इजाज़त होती तो वो ये वसीयत करके जाते की अमीर खुसरू को उनके साथ उनकी ही कब्र में दफन किया जाए. सबसे बड़ी बात तो ये है की हजरत निजामुद्दीन औलिया महबूब-ए-इलाही के इंतकाल फरमा जाने के कुछ ही दिन बाद खुद अमीर खुसरू भी ना रहे. आज दोनों गुरु-चेले की दरगाह एक साथ दिल्ली के निजामुद्दीन क्षेत्र में आस-पास बनी हैं.

अब हम बात करते हैं साईं भक्ति में अमीर खुसरू की. अमीर खुसरू का अपने गुरु, अपने मालिक, अपने दाता पर इतना अनुराग था की वो एक लम्हे के लिए भी अपने गुरु से दूर नहीं होना चाहते हैं. अमीर खुसरू भक्ति परंपरा के अग्रणी कवियों में शामिल हैं. भक्ति और समर्पण किसे कहते हैं ये अमीर खुसरू के जीवन की घटनाओ और उनके तमाम कलाम को पढ़ कर पता चलता है. "चाप-तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाये के" इस मशहूर कव्वाली को आप सभी ने सुना होगा इसी में एक शेर है "खुसरू निजाम के बली-बली जाए, मोहे सोहागन कीनी रे मोसे नैना मिले के". यहाँ सोहागन शब्द का प्रयोग है जिसे बहुत से लोग सुहागन पढ़ते हैं. सोहागन है वो शख्स जो खुद सोहागा हो गया है और किसी को भी सोना बनाने की ताक़त रखता है. वास्तव में गुरु भक्ति और समर्पण जो समझ गया वही सोना हो गया. हजरत अमीर खुसरू किसी कलाम में सचमच ये ताक़त है की वो किसी को भी 'भक्ति और समर्पण' की राह पर ला सकते हैं.

जिस दिन अमीर खुसरू जैसा प्यार, समर्पण, भक्ति, अनुराग, बेकरारी और मिलन की बेचैनी हम साईं भक्तो में हमारे श्रीसाईं किसी लिए पैदा हो जायेगी मेरा, एक साईं सेवक का, अपने गुरु, अपने मालिक की तरफ से आपसे वादा है की आप श्रीसाईं से एकाकार हो जायेगे. श्रीसाईं आपको वो देंगे जो आपने कभी सोचा भी ना होगा, माँगना तो बहुत दूर की बात है. इसलिए मेरा आपने निवेदन है की अपने मन में श्रीसाईं किसी लिए अमीर खुसरू जैसी भक्ति और समर्पण पैदा करें. -जय साईंराम