Thursday, March 18, 2010
बाबा और उनका ब्रह्मज्ञानी
एक धनी व्यक्ति ( दुर्भाग्य से मूल ग्रंथ में उसका नाम और परिचय नहीं दिया गया है ) अपने जीवन में सब प्रकार से संपन्न था। उसके पास अतुल सम्पत्ति, घोड़े, भूमि और अनेक दास और दासियाँ थीं। जब बाबा की कीत्र्ति उसके कानों तक पहुँची तो उसने अपने एक मित्र से कहा कि "मेरे लिए अब किसी वस्तु की अभिलाषा शेष नहीं रह गई है, इसलिए अब शिरडी जाकर बाबा से ब्राहृज्ञान प्राप्त करना चाहिए और यदि किसी प्रकार उसकी प्राप्ति हो गई तो फिर मुझसे अधिक सुखी और कौन हो सकता है?'' उनके मित्र ने उन्हें समझाया कि "ब्राहृज्ञान की प्राप्ति सहज नहीं है, विशेषकर तुम जैसे मोहग्रस्त को, जो सदैव स्त्री, सन्तान और द्रव्योपार्जन में ही फँसा रहता है। तुम्हारी ब्राहृज्ञान की आकांक्षा की पूत्र्ति कौन करेगा, जो भूलकर भी कभी एक फूटी कौड़ी का भी दान नहीं देता ?''
अपने मित्र के परामर्श की उपेक्षा कर वे आने-जाने के लिए एक ताँगा लेकर शिरडी आये और सीधे मस्जिद पहुँचे। साईबाबा के दर्शन कर उनके चरणों पर गिरे और प्रार्थना की कि "आप यहाँ आनेवाले समस्त लोगों को अल्प समय में ही ब्राहृ-दर्शन करा देते हैं, केवल यही सुनकर मैं बहुत दूर से इतना मार्ग चलकर आया हूँ । मैं इस यात्रा से अधिक थक गया हूँ। यदि कहीं मुझे ब्राहृज्ञान की प्राप्ति हो जाए तो मैं यह कष्ट उठाना अधिक सफल और सार्थक समझूँगा।''
बाबा बोले " मेरे प्रिय मित्र । इतने अधीर न होओ। मैं तुम्हें शीघ्र ही ब्राहृ का दर्शन करा दूँगा। मेरे सब व्यवहार तो नगद ही हैं और मैं उधार कभी नहीं करता। इसी कारण अनेक लोग धन, स्वास्थ्य, शक्ति, मान, पद आरोग्य तथा अन्य पदार्थो की इच्छापूत्र्ति के हेतु मेरे समीप आते हैं। ऐसा तो कोई विरला ही आता है, जो ब्राहृज्ञान का पिपासु हो । भौतिक पदार्थों की अभिलाषा से यहाँ आने वाले लोगों का कोई अभाव नहीं, परन्तु आध्यात्मिक जिज्ञासुओं का आगमन बहुत ही दुर्लभ है। मैं सोचता हूँ कि यह क्षण मेरे लिए बहुत ही धन्य तथा शुभ है, जब आप जैसे महानुभाव यहाँ पधारकर मुझे ब्राहृज्ञान देने के लिए जोर दे रहे हैं। मैं सहर्ष आपको ब्राहृ-दर्शन करा दूँगा।''
यह कहकर बाबा ने उन्हें ब्राहृ-दर्शन कराने के हेतु अपने पास बिठा लिया और इधर-उधर की चर्चाओं में लगा दिया, जिससे कुछ समय के लिए वे अपना प्रश्न भूल गए। उन्होंने एक बालक को बुलाकर नंदू मारवाड़ी के यहाँ से पाँच रुपए उधार लाने को भेजा । लड़के ने वापस आकर बतलाया कि नन्दू का तो कोई पता नहीं है और उसके घर पर ताला पड़ा है। फिर बाबा ने उसे दूसरे व्यापरी के यहाँ भेजा। इस बार भी लड़का रुपए लाने में असफल ही रहा। इस प्रयोग को दो-तीन बार दुहराने पर भी उसका परिणाम पूर्ववत् ही निकला।
हमें ज्ञात ही है कि बाबा स्वयं सगुण ब्राहृ के अवतार थे। यहाँ प्रश्न हो सकता है कि इस पाँच रुपये जैसी तुच्छ राशि की यथार्थ में उन्हें आवश्यकता ही क्या थी? और उस ऋण को प्राप्त करने के लिए इतना कठिन परिश्रम क्यों किया गया? उन्हें तो इसकी बिलकुल आवश्यकता ही न थी। वे तो पूर्ण रीति से जानते होंगे कि नन्दूजी घर पर नहीं है। यह नाटक तो उन्होंने केवल अन्वेषक के परीक्षार्थ ही रचा था। ब्राहृजिज्ञासु महाशय जी के पास नोटों की अनेक गड्डियाँ थीं और यदि वे सचमुच ही ब्राहृज्ञान के अकांक्षी होते तो इतने समय तक शान्त न बैठते। जब बाबा व्यग्रतापूर्वक पाँच रुपये उधार लाने के लिऐ बालक को यहाँ-वहाँ दौड़ा रहे थे तो वे दर्शन बने ही न बैठे रहते। वे जानते थे कि बाबा अपने वचन पूर्ण करके ऋण अवश्य चुकायेंगे। यद्यपि बाबा द्वारा इच्छित राशि बहुत ही अल्प थी, फिर भी वह स्वयं संकल्प करने में असमर्थ ही रहा और पाँच रुपया उधार देने तक का साहस न कर सका। पाठक थोड़ा विचार करें कि ऐसा व्यक्ति बाबा से ब्राहृज्ञान, जो विश्व की अति श्रेष्ठ वस्तु है, उसकी प्राप्ति के लिए आया है। यदि बाबा से सचमुच प्रेम करने वाला अन्य कोई व्यक्ति होता तो वह केवल दर्शक न बनकर तुरन्त ही पाँच रुपये दे देता। परन्तु इन महाशय की दशा तो बिलकुल ही विपरीत थी। उन्होंने न रुपये दिए और न शान्त ही बैठे, वरन् वापस जल्द लौटने की तैयारी करने लगे और अधीर होकर बाबा से बोले कि " अरे बाबा! कृपया मुझे शीघ्र ब्राहृज्ञान दो। बाबा ने उत्तर दिया कि " मेरे प्यारे मित्र ! क्या इस नाटक से तुम्हारी समझ में कुछ नहीं आया? मैं तुम्हें ब्राहृदर्शन कराने का ही तो प्रयन्त कर रहा था ! संक्षेप में तात्पर्य यह है कि ब्राहृ का दर्शन करने के लिए पाँच वस्तुओं का त्याग करना पड़ता है:- (1) पाँच प्राण (2) पाँच इन्द्रियाँ (3) मन (4) बुद्धि तथा (5) अहंकार। यह हुआ ब्राहृज्ञान। आत्मानुभूति का मार्ग भी उसी प्रकार है, जिस प्रकार तलवार की धार पर चलना ।''
श्रीसाईं की कथा अनंत है, साईंनाम अनमोल जनम सफल हो जाएगा, साईं-साईं बोल बाबा की लीलाए जितनी मनमोहक हैं उनका रहस्य और तात्पर्य उससे भी अधिक गूढ़ है. वास्तव में बाबा की इस लीला के पीछे भक्तो के मोहग्रस्त मन को माया के पाश से मुक्त कराना और वास्तविक मुमुक्षुओ को सही मार्ग दिखाना था. अब हम उन सज्जन की बात करते हैं जो ब्रह्मज्ञान के लिए व्यग्र थे. मेरे अबोध मन में जो जिज्ञासा या विचार हैं वो मैं यहाँ आप सभी साईं भक्तो के चरणों में अर्पित कर रहा हूँ. यदि मेरे विचारों से आप सहमत नहीं तो मुझे मार्गदर्शन दीजिये और यदि सहमत हैं तो आशीर्वाद.
वास्तव में बाबा की इन सज्जन पर बहुत कृपा रही होगी जो बाबा ने अपनी एक विलक्षण लीला में उन्हें सांकेतिक रूप से प्रयोग किया. कथा के आरम्भ में ही लिखा गया है की 'दुभाग्यवश मूल ग्रन्थ में इन सज्जन का नाम नहीं है'. ये दुर्भाग्य नहीं बाबा का इन सज्जन को आशीर्वाद है ऐसा मुझे लगता है. श्रीसाईं के पास ब्रह्मज्ञान के लिए एक ही व्यक्ति आया और बाबा ने उसे भी ब्रह्मज्ञान देने के स्थान पर उसका उपहास किया ऐसा सोचना भी मूर्खता जैसी ही स्थिति है. मेरा साईं जो सबके लिए माँ और बाप के सामान है वो ब्रह्मज्ञान मांगने वाले का उपहास नहीं कर सकता.
श्रीसाईं सत्चरित्र इस कथन को सत्य सिद्ध करती है की आदरणीय बूटी साहेब, खापर्डे साहब, शमा गुरुजी, नाना साहेब चांदोरकर या स्वयं दासगणु महाराज जैसे सतत साईं अनुयायियो ने भी बाबा से कभी ब्रह्मज्ञान नहीं माँगा. मेरे विचार में इन सज्जन का नाम ग्रन्थ में इसलिए नहीं है क्यूंकि इनका नाम लिखने से इन सज्जन के व्यापार या परिवार से जुड़े सभी व्यक्तियों के लिए ऐसी ही धारणा बन जाती तो बाबा की अन्तःप्रेरणा से मूल ग्रन्थ में इन महाशय का नाम नहीं है.
एक बात ये की जिस साईं के सामने प्रबुद्ध और धनाढ्य व्यक्तियो के विचार और व्यवहार भी शांत हो जाते थे उनके सामने ये महाशय किस प्रकार अपने धन का प्रदर्शन कर सकते थे ? बाबा स्वयं समर्थ थे और यदि वे इन महाशय से दक्षिणा चाहते तो स्वयं साधिकार मांग सकते थे. बाबा ने किसी से भी दक्षिणा इसलिए नहीं ली क्यूंकि उसके पास बहुत धन है. बाबा ने दक्षिणा इसलिए मांगी क्यूंकि वो सबकुछ उनका ही तो है. फिर इन महाशय के स्वयं धन अर्पित करने की प्रतीक्षा क्यूँ ? विचार कीजिये की यदि आप इन सज्जन के स्थान पर हैं और बाबा से कहते हैं की "बाबा! मुझसे पांच रूपए ले लो" तो क्या ऐसा नहीं हो सकता था की बाबा उनसे कहते "तू मुझे धन देगा ? तेरे पास है इतना की तू साईं को दे सके ?" ऐसे में स्थिति और भी खराब होती.
दूसरी बात धनवान व्यक्ति वास्तव में सहज नहीं होते. धन की माया किसी को भी असहज और अनावश्यक रूप से विचारशील बना देती है. इन सज्जन को तो शायद ये लगा ही नहीं होगा की बाबा उस बालक को इसलिए दौड़ा रहे हैं की इन सज्जन को शिक्षा मिले वो तो यही विचार कर रहे होंगे की बाबा जल्द से जल्द उन्हें ब्रह्मज्ञान दें. इन सज्जन के लिए ब्रह्मज्ञान पाना किसी अन्य वस्तु को पाने जैसा ही रहा होगा. सांसारिक व्यापार को चलाने वाला आध्यात्मिक व्यवहार को नहीं समझता होगा ऐसा हम समझ सकते हैं.
आखिरी बात ये की शायद ये महाशय ब्रह्मज्ञान और गुरुमंत्र में भेद ही ना कर पाए हों. गुरुमंत्र तो गुरु एक साधारण और अत्यंत आत्मीय परिस्थिति में कभी भी दे सकता है. कैसे श्रीमती कानिटकर जो बहुत छोटी उम्र में बाबा के दर्शन करने अपने परिवार के साथ गयी थी. बाबा ने उनके पैरो पर हाथ फेरकर कहा था 'जा राममय हो जा'. कहते हैं 80 वर्ष की अवस्था में भी वो अपने पैरो से भलीभांति चल सकती थी. जिस प्रकार सहजता से श्रीमति रमाबाई कानिटकर को 'रामनाम' जप का गुरुमंत्र मिला था उसी प्रकार राधाबाई देशमुख को बाबा ने कोई गुरुमन्त्र नहीं दिया. इसी प्रकार शायद ये सज्जन गुरुमंत्र की अभिलाषा में आये होंगे और श्रीसाईं की लीलावश 'ब्रह्मज्ञान' मांग बैठे.
इस प्रकार मैं ह्रदय से श्रीसाईं और उनके इस महान भक्त के चरणों में नतमस्तक हूँ जिनकी अहैतुकी कृपा से हमें ब्रह्मज्ञान जैसा विलक्षण उपदेश प्राप्त हुआ. मेरी श्रीसाईं से प्रार्थना है की हमे भी अपनी लीला का पात्र बनाए रखें. जय साईंराम
Saturday, January 16, 2010
बाबा का न्यायालय: चिंचनिकर चावडी
लगभग 36,525 दिन पहले बाबा ने द्वारकामाई के अलावा एक और जगह को अपना ठिकाना बनाया था। बाबा ने फैसला किया किया की वो एक दिन छोड़कर पास ही में एक टूटी सी ईमारत में रात को विश्राम करेंगे. द्वारकामाई में तात्या और म्हाल्सपतिजी बाबा के साथ रात को चिंतन, मनन, ध्यान और थोडा सा विश्राम करते थे मगर चावडी में किसी को भी बाबा के साथ रुकने की आज्ञा नहीं थी. बाबा चावडी में ध्यान भी करते और अपने भक्तो के लिए मालिक से प्रार्थना भी करते. चावडी में बाबा को छोड़ने के बाद शिर्डी के किसी भी व्यक्ति ने बाबा की आवाज़ नहीं सुनी. बाबा चावडी में केवल ध्यान ही किया करते थे? बाबा का चावडी में सोने का क्या कारण था? चावडी में महिलाओं का प्रवेश वर्जित क्यूँ था? वैसे तो बाबा की लीला बाबा ही जानें मगर बाबा की ही कृपा और करुणा से हम बाबा की इस मनमोहक लीला को समझने का प्रयास करते हैं.
बाबा हर दुसरे दिन चावडी में रात बिताते थे. बाबा की दया से जहाँ तक मेरा विचार है वास्तव में चावडी बाबा का न्यायालय थी. द्वारकामाई में बाबा हर उस आने वाले की इच्छा पूरी करते थे जो उनसे कुछ मांगता था, तो बाबा ने ऐसा क्यूँ कहा की "अगर सभी बौर बन जाएँ तो फलो की गिनती करना ही असंभव हो जाएगा." यानि बाबा सबको देने का सामर्थ्य रखते हुए भी सुपात्र का विचार ज़रूर करते थे. द्वारकामाई में जब भक्तो को दे देते थे तब चावडी में बैठकर उस भक्त को अपनी दी हुयी भेंट के लिए सुपात्र बनाने का कार्य भी करते थे. एक वर्णन आता है जहाँ बाबा ने अपने एक भक्त की शराब की बुरी आदत छुडवाने के लिए उसे बहुत मारा था, वो मारना स्वप्न में ज़रूर था मगर उसका असर वास्तविक था.आज भी अगर हम बाबा से कुछ मांगते हैं तो हो सकता है हम अपनी मांगी हुयी चीज़ के लिए सुपात्र ना हों, लेकिन बाबा आज भी चावडी में बैठकर हमे, हमारी मांग के लिए हमे सुपात्र बनाते हैं. बाबा ने कहा है "श्रद्धा रखो और सब्र से काम लो". अगर बाबा ने हमे देना ही है तो सब्र किस बात का? वास्तव में बाबा ने सब्र करने को इसीलिए कहा है की वो चाहते हैं की हम बौर की तरह पूरी श्रद्धा और सब्र से इंतज़ार करें जिससे हमे हमारे कर्मो का स्वादिष्ट और सुगन्धित फल मिले. चावडी में बैठकर बाबा का न्यायालय पूरा न्याय करता है अगर दोष हम में है तो सजा भी हमे ही भुगतनी होगी और बाबा ने तो साफ़ बताया है की कई जन्मो में सजा पूरी करने से अच्छा है की हम इसी जन्म में बाबा की निगरानी में अपनी सजा पूरी करें और फिर स्वयं बाबा के चरणों में विलीन हो जाएँ.मेरे विचार से आप कितना इत्तेफाक रखते हैं ये तो मैं नहीं जानता मगर मुझे यकीन है आज भी चावडी में बाबा से अपने किये तमाम गुनाहों की माफ़ी मांग लेने से बाबा हमे मालिक से इन्साफ दिलाते हैं और हमे गलती करने से रोक भी लेते हैं. बाबा की चावडी में बाबा का दरबार भले ही ना लगता हो मगर फैसला तो बाबा चावडी में बैठकर ही सुनाते हैं. तो हम ये मान सकते हैं की मशीदमाई हमें कभी निराश नहीं करती. मशीदमाई का साईं हमें देता है मगर चावडी में बैठकर हमारी समीक्षा और समाधान करने के बाद देता है. श्रीसाईं के इस न्यायालय को फैसले देते सौ साल दिसंबर 2009 में पूरे हो जायेंगे और शायद ये सृष्टि का एकमात्र न्यायालय होगा जिसके फैसले कभी गलत नहीं होते. बाबा के इस न्यायालय को इस लौकिक जगत के सौ साल पूरे होने पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें. जय साईंराम.
Thursday, January 14, 2010
आइये जानें कौन थे हेमाद्रीपन्त?
तेरहवी शताब्दी में कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ के एक छोटे से ग्राम हेमाद्री के स्मार्त ऋग्वेदी, वत्स गोत्री, शाकालशक्शी कर्हाड़े ब्राह्मण परिवार में जन्मे हेमाद्रिपंत को उनके पिता कामदेओ बहुत छोटी उम्र में महाराष्ट्र ले आये थे.
दक्षिणपश्चिम भारतवर्ष के यादव शासन काल में प्रधानमन्त्री के महत्त्वपूर्ण पद पर रहते हुए हेमाद्रिपंत स्वयं में एक कुशल प्रशासक, वास्तुकार, कवि और आध्यात्म्विद रहे हैं. हेमाद्रिपंत के प्रधानमंत्रीत्व में यादवकुल का सूर्य अपने चरम पर था और इनके बाद पठान बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली और भारत पर कब्ज़ा कर लिया.
हेमाद्रिपंत ने बहुत-सी धार्मिक पुस्तकें लिखीं जिनमे चतुर्वर्ग चिंतामणि है जिसमे हज़ारों व्रतों और उनके करने के विधान का वर्णन है. चिकित्सा के सम्बन्ध में इन्होने आयुर्वेद रहस्यं पुस्तक लिखी जिसने हजारो बीमारियो और उनके निदान के बारे में लिखा गया है।
इन्होने एक इतिहासिक पुस्तक भी लिखी जिसका नाम हेमाद्पंती बखर है. हेमाद्रिपंत ने प्रशासन और राजकीय कार्यो में एकरूपता लाने के लिए एक पुस्तक भी लिखी जिसमे राज-काज के दैनिंदिन कार्यो की प्रक्रिया को विस्तार से निश्चित किया गया है।
हेमाद्रिपंत ने मोदी लिपि को सरकारी पत्रव्यवहार की भाषा बनाया. गोंदेश्वर मंदिर, तुलजा भवानी और अनुधा नागनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर और रत्नागढ़ के अमृतेश्वर मंदिर को हेमदपंथी वास्तुकारिता से बनाया गया है जिसका सृजन हेमाद्र्पंत ने किया था
हेमाद्रिपंत ने भारत में बाजरे के पौधे, जिसे कन्नड़ में सज्जे, तमिल में कम्बू, तेलुगु में सज्जालू, मराठी में बाजरी और उर्दू, पंजाबी या हिंदी में बाजरा कहा जाता है, को बहुत प्रोत्साहन दिया. महाराष्ट्र में महालक्ष्मी के पूजन को प्रोत्साहित और वैभवशाली बनाने में भी हेमाद्रिपंत का बहुत योगदान है.
विकिपेडिया नाम की वेबसाइट से प्राप्त इस जानकारी के आधार पर हम समझ सकते हैं की श्रीसाईं का ज्ञान और व्यापकता कितनी विस्तृत थी की श्री गोविन्द रघुनाथ दाभोलकर जी को बाबा ने तेरहवी सदी के इस महान विद्वान के नाम से सुशोभित किया. धन्य हैं श्रीसाईं.
Saturday, August 29, 2009
ये गर्व भरा मस्तक मेरा...

Saturday, July 25, 2009
श्रद्धा और सबूरी - भाग दो
Wednesday, June 17, 2009
मानसिक चिकित्सा है श्रद्धा और सबूरी

Sunday, May 31, 2009
बाबा ने त्रिपुन्ड लगाने से भी मना किया था.

पिछले अंक में हमने देखा था कि बाबा ने द्वारकामाई मशीद के जीर्णोद्दार को रोकने का प्रयास किया था. इसके पीछे शायद बाबा का सन्देश था की मेरे लिए भव्य देवालयों के निर्माण कि कोई आवश्यकता नहीं है. मगर भक्तो के प्रेमवश करुणावतार श्रीसाईं ने द्वारकामाई के जीर्णोद्धार की आज्ञा दे दी. इसी प्रकार बाबा ने अपने मस्तक पर त्रिपुंड यानी महादेव के सामान तीन लकीरों वाले तिलक कि आज्ञा भी किसी को नहीं दी थी. श्रीसाईं सत्चरित्र में वर्णन है की कैसे और किस भक्त को सबसे पहले त्रिपुंड लगाने की आज्ञा मिली. लीजिये श्रीसाईं कथा का श्रवण कीजिये.
"एक बार श्री तात्या नूलकर के मित्र डॉक्टर पंडित बाबा के दर्शनार्थ शिरड़ी पधारे। बाबा को प्रणाम कर वे मस्जिद में कुछ देर तक बैठे। बाबा ने उन्हें श्री दादा भट केलकर के पास भेजा, जहाँ पर उनका अच्छा स्वागत हुआ। फिर दादा भट और डॉ. पंडित एक साथ पूजन के लिए मस्जिद पहुँचे। दादा भट ने बाबा का पूजन किया। बाबा का पूजन तो प्राय: सभी किया करते थे, परन्तु अभी तक उनके शुभ मस्तक पर चन्दन लगाने का किसी ने भी साहस नहीं किया था। केवल एक म्हालसापति ही उनके गले में चन्दन लगाया करते थे। डॉ. पंडित ने पूजन की थाली में से चन्दन लेकर बाबा के मस्तक पर त्रिपुण्डाकार लगाया। लोगों ने महान् आर्श्चय से देखा कि बाबा ने एक शब्द भी नहीं कहा। सन्ध्या समय दादा भट ने बाबा से पूछा, "क्या कारण है कि आप दूसरों को तो मस्तक पर चन्दन नहीं लगाने देते, परन्तु डॉ. पंडित को आपने कुछ भी नहीं कहा?'' बाबा कहने लगे," डॉ. पंडित ने मुझे अपने गुरु श्री रघुनाथ महाराज धोपेश्वरकर, जो कि काका पुराणिक के नाम से प्रसिद्ध हैं, के ही समान समझा और अपने गुरु को वे जिस प्रकार चन्दन लगाते थे, उसी भावना से उन्होंने मुझे चन्दन लगाया। तब मैं कैसे रोक सकता था?'' पूछने पर डाँ. पंडित ने दादा भट से कहा कि मैंने बाबा को अपने गुरु काका पुराणिक के समान ही जानकर उन्हें त्रिपुण्डाकार चन्दन लगाया है, जिस प्रकार मैं अपने गुरु को सदैव लगाया करता था।"
इसके पश्चात मेघा बाबा को महादेव का अवतार समझकर उनके पावन विशाल मस्तक पर त्रिपुंड लगाया करते थे. आज हम चर्चा करेंगे की बाबा ने त्रिपुंड लगाने की आज्ञा भक्तो को क्यूँ नहीं दी थी? यहाँ मैं स्पष्ट कर दू ये विचार मेरे खुद के मन में उठ रहे हैं और मैं किसी भी परंपरा या मज़हब के विरुद्ध नहीं हूँ.
बाबा हमेशा से इस बात का विरोध करते रहे की उनके धर्म और जन्म के विषय में कोई प्रश्न करे. वास्तव में संत और महात्मा किसी भी धर्म या जाति विशेष के नहीं होते. संत को काम होता है समाज को मोह से ऊपर उठाकर परमपिता की सेवा और राह में लगाना. जहाँ तक सनातन धर्म का सम्बन्ध है तो सनातन धर्म का तो लक्ष्य ही मोक्ष की प्राप्ति है. मोक्ष वो है जो धर्म से ऊपर है. मोक्ष वो है जिसके लिए समाज और मानव के बनाय कोई भी बंधन मान्य नहीं हैं. इसी प्रकार बाबा जो स्वयं मोक्षदाता हैं अपनी इस लीला के द्वारा भक्तो को सन्देश देते हैं की उन्हें किसी भी धर्म विशेष से ना जोड़ा जाए. मगर यहाँ भी बाबा भक्तो के प्रेम से वशीभूत होकर डॉक्टर पंडित को त्रिपुंड की आज्ञा दे देते हैं.
आज शिर्डी जाने वालो को महसूस होता है की शायद श्रीसाईं बाबा कोई हिन्दू संत थे. बाबा की चार आरतिया होती हैं, बाबा का मंगलस्नान होता है, बाबा को भोग लगता है, रामनवमी-गुरु पूर्णिमा-दशहरा माने जाते हैं मगर रामनवमी के साथ उर्स का जो आरम्भ हुआ था वो नादाराद है, चन्दन उत्सव की कोई चर्चा नहीं होती, यहाँ तक कि इसलाम या दुसरे धर्मो का आस-पास कहीं भी चिन्ह नहीं है. द्वारकामाई मशीद में आज भी एक 'आला' है जहाँ मुसलमान नमाज़ पढ़ते हैं, मगर अजान कि कोई आवाज़ नहीं होती. बाबा ने तो शिक्षा दी है है कि सब धर्मो का सम्मान करो मगर ईद और बड़ा दिन (क्रिसमस) जैसे मुख्य गैर-हिन्दू त्यौहार आज शिर्डी में नहीं माने जाते.
बाबा के समय में भी रामलाल पंजाबी के अतिरिक्त किसी सिख भक्त वर्णन श्रीसाईं सत्चरित्र में नहीं है और सिर्फ पंजाबी लिखा होने से ही वो सिख हैं ऐसा नहीं माना जा सकता. 1918 में बाबा का भौगोलिक क्षेत्र बहुत सीमित था. बाबा के स्वयं सशरीर विचरण का स्थान नीम गाँव और रहाता तक था मगर बाबा त्रिकालज्ञ थे उन्हें दुनिया में हो रही सब घटनाओं का पूर्ण ज्ञान था. मेरे विचार से हमे श्रीसाईं बाबा और उनकी लीलाओं को और प्रेमपूर्वक समझने की आवश्यकता है. हमें बाबा से प्रार्थना करनी चाहिए की 'हे! प्रेम, दया, करुणा, और कृपा की साक्षात् मूर्ती, हमें शक्ति और विवेक दो की हम आपकी लीलाओ में छिपे आपके सन्देश को समझ सकें.' जय साईंराम
